Monday, February 19, 2018

LEFT VS RIGHT IN TRIPUPURA

बहुत दिनों के बाद ब्लाग पर हूं। वैसे तो उत्तर पूर्व के तीन राज्यों में चुनावी फिजा जोरों पर हैलेकिन त्रिपुरा का चुनाव कासा अहम हो चला है । देश में पहली बार लेफ्ट और राइट आमने सामने है। जहां वाम मोर्चा लगातार २४ सालों से सत्ता पर काबिज है वहीं पहली बार भाजपा वाम मोर्चे को टक्कर देती दिख रही है । २०१३ में जब वहां गया था चुनाव कवर करने तो माहौल कुछ ज्यादा ही गर्म था लेफ्ट फ्रंट के खिलाफ । सन २०११ में बंगाल में परिवर्न की  हवा ने ३७ वर्षों के वाम शासन को ममता दीदी की पार्टी ने ध्वस्त कर दिया था । चूंकि बंगाल और ट्रिपुरा की राजनीति में बहुत सारी समानताओं हैं तो मुझे भी लगा कि अब यहां यानि त्रिपुरा में भी वाम शासन का अंत हो जाएगा । स्थानिय मीडिया से लेकर राजनीतिक विश्लेषक की भविष्वानियां अखबारों की सुर्खियों पे छाइ थी कि अब परिवर्न में ४ दिन शेष ३ दिन शेष २ दिन शेष । लेकिन जब परिणाम आया तो ६० सीटों में से वाम फ्रंट ने ५० सीटें जीतकर नया इतिहास रच दिया । यानि २००८ के मुकाबले ४ सीट ज्यादा । अंग्रेजी अखबार त्रिपुरा टाइम्स जो लगातार एंटी लेफ्ट खबरें लिख रहा था परिणाम के बाद उसका हेडलाइन था रेड रेड रेड । बंगाल और त्रिपुरा में फर्क ये था कि त्रिपुरा में स्टूडेंट विंग ..डीवाइएफआइ . वाम मोर्चे का सांस्कृतिक संगठन  बहुत मजबूत है जबकि बंगाल में वाम मोर्चे का पराभव का कारण इन संगठनों का कमजोर होना था । खैर ये तो बीती बात हो गइ । वर्तमान चुनाव की पृष्ठभूमि को थोडा खंगालना होगा । २०१३ के बाद तृममूल के तत्कालिन  त्रिपुरा प्रभारी मुकुल राय के सौजन्य से कांग्रेस के १० विधायक तृणमूल में शामिल हो गये और टीएमसी त्रिपुरा में मुख्य विपक्षी दल हो गया । कुछ दिनों के बाद जब मुकुल राय ने बीजेपी का दामन थामा तो वही विधायक पैसे के बल पे भाजपा में शामिल हो गये । अब बीजेपी बिना मैंडेट के त्रिपुरा में मुख्य विपक्षी दल हो गया । इस चुनाव में कांगेरेस का वोट वीजेपी में लगभग ट्रांसफर हो गया है । मुस्लिम भी हो सकता है कि १० प्रतिशत बीजेपी को वोट करेगा । अब सवाल ये है कि क्या बीजेपी लेफ्ट के वोट प्रतिशत में सेंध लगा पाएगी जिसकि प्रत्याशा नग्न्य है । प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा का पूरा अमला लगा रहा चुनावी प्रचार से लेकर धन बल के हथकंडों के साथ । पीएम ने जो आरोप लगाये मािक सरकार पर मािक सरकार ने पलट कर जबाब भी नही दिया । बीजेपी ना आरोप था कि त्रिपुरा में कर्मचारियों के लिये चौथा वेतन आयोग है और पूरे देश में सांतवां वेतन आयोग है । न्यूनतम मजदूरी का दर भी त्रिपुरा में कम है । लेफ्ट ने पलटवार करते हुये कहा कि बीजेपी शासित महाराष्ट्र , गुजरात और राजस्थान के मुकाबले त्रिपुरा के सरकारी कर्मचारियों को ज्यादा सहूलियतें हैं । अब मीडिया और सोशल मीडिया में वाम मोर्चे सरकार की पलटी की बात चल रही है । चलो पलटाई बीजेपी का नारा है तो लेफ्ट समर्थक कह रहे है कि चलो उल्टाइ यानि यथा स्थिती बरकरार रहेगा । इस चुनाव ने मुझे यह भी अहसास कराया कि कांग्रेस और भाजपा की कम से कम आर्थिक नीतियों में कोइ अंतर नही है । अगर कोइ आडियोलोजी कांग्रेस की होती तो वो रातोरात भाजपाइ नही हो जाते ।

Thursday, June 9, 2016

left-right




कांग्रेस के लाख दुर्दीन आ जायें। हेराफेरी और सीना जोरी से कांग्रेसी बाज नही आते । बात हम बंगाल चुनाव की कर रहे है । बंगाल में ममता बनर्जी की जोरदार वापसी हुइ। कांग्रेसी अपनी साख बचा पाये लेकिन लेफ्ट की लुटिया डूब गइ। बंगाल चुनाव कवर कर रहा था । गांवों में शहरों में जब घूमता था तो लोग कहते थे की ममता की सरकार बनेगी लेकिन उनकी सीटें घटेंगी । दस में से नौ लोगों का यही कहना था । एक चीज जो उलट लग रही थी कि कभी बंगाल के गांवों में लेफ्ट का दबदबा होता था लेकिन जब गांवों में हम घूम रहे थे तो मामला उल्टा चल रहा था । एक बडी बात जो हमने देखी खासकर जब कांग्रेसियों से पूछता था कि आपकी पार्टी का क्या हाल है तो कांग्रेसियों का जबाब था कि ८० प्लस लायेंगे । जब हम पूछते थे कि जहां जहां लेफ्ट लड रहा है वहां क्या कांग्रेसी भी मन के साथ उन्हें वोट कर रहे है ..उनका जबाब था कि वो सब तो ठिक है लेकिन जैसे ही इवीएम मशीन पर हसिया हथौडा देखते है तो लेफ्ट का वो वर्बर ३४ साल याद आ जाता है । आपको याद होगा कि लोकसभा चुनावों के पहले ममता ने कहा था कि जरुरत पडी तो टीएमसी और लेफ्ट साथ आ सकते है । यह ममता के आत्मविश्वास के डिगने का घोतक था । लेफ्ट के आत्मविश्वास को देखिये कि जिस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के बारे में कहा करती थी कि कांग्रेस और भाजपा में कोइ फर्क नही है उसी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से बाज नही आइ। टीएसी भी यही चाहती थी कि विपक्ष में कांग्रेस आये और लेफ्ट को धाराशायी कर दो ऐसी  कमर टूटे कि आने वाले दिनों में खडी ही नही हो पाये । 

Thursday, June 27, 2013

लालू-नीतिश-पासवान पुराण ( भाग-१)


शाहनवाज हुसैन ने पटना में एक रैली को संबोधित करते हुये कहा कि नीतिश सत्ता से बाहर रह ही नही सकते । वो हवाला १९९५ का दे रहे थे जब समता पार्टी बिहार में लालू के मुकाबले बुरी तरीके से पीट गइ थी । चुनाव परिणामों के बाद नीतिश ने कहा था कि अब वो राजनीति छोडकर किताब लिखेंगे । फिर कुछ दिनों के बाद ये खबर आइ कि नीतिश बिहार में रहकर ही लालू सरकार के खिलाफ सडक पर संघर्ष करेंगे । बात आइ गइ हुइ बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन हुआ और केंद्र में एनडीए की सरकार बनी । नीतिश कुमार को चूंकि अटल बिहारी बाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था । उन्हें रेल मंत्री के पद से नवाजा गया । बिहार में रहकर संघर्ष करने की बात हवा में रह गइ। नीतिश और लालू के बीच आपसी बैमनस्य इतना था कि रेल डिब्बों मे दूधिया लोग जो लालू की जाति के है नीतिश के आदेश पर उन्हें आरपीएसएफ के द्वारा डंडो से पिटाइ की जाती थी । जातियता की अगर बात करें तो रेल के विभिन्न मलाइदार पदों पर नीतिश ने अपनी जाति के लोगों को चुन चुन कर बिठाया । हां नीतिश को इतना आभास था कि लालू को भविष्य में पछाडा जा सकता है । चूंकि लालू कहा करते थे कि वोट का पैमाना विकास नही है जातिगत समीकरण ही वोट का पैमाना है । इस नब्ज को पकडकर नीतिश ने बिहार में रेल के विकास पर बहुत काम किया । पहली बार जब लालू पशुपालन घोटाले में जेल गये तो बेउर जेल उनके समर्थ उन्हें दूल्हे की तरह बिठाकर जेल के दरवाजे पे ले गये । समर्थक नारे लगा रहे थे कि जेल का फाटक टूटेगा ..लालू यादव छूटेगा । राजनीति में परिवारवाद का मुखाफलत करने वाले लालू को अपनी पार्टी के किसी नेता पर विश्वास नही रहा। जब बातें हवा में चल रही थी कि लालू के जेल जाने के बाद सीएम का पद कौन संभालेगा ..इसपर टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर छपी कि रंजन प्रसाद यादव..जयप्रकाश नारायण यादव या आर के राणा में से किसी को लालू गद्दीशीन करेंगे । अगले दिन जनसत्ता में ये खबर छपी कि अंदरखाने में लालू ने बिहार की कमान अपनी पत्नी को सौंप दी है । इस खबर पर राजद और अन्य दलों के नेता खूब हंसे। अगले दिन विधायक दल की बैठक हुइ..किसी को इसका आभास नही था कि राबडी देवी को नेता चुन लिया जाएगा । हालांकि सब प्री प्लान था ..लालू के सबसे विश्वस्त श्याम रजक ने राबडी के नाम का प्रस्ताव किया ..भला किसमें दम था इसका विरोध करने का । राबडी मुख्यमंत्री बनी और लालू जेलयात्रा पर निकल गये । अब राबडी जो साहब के लिये खैनी मांग कर लाती थी सीएम क्वार्टर के आस पास के लोगों से सीधा बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गइ। अनपढ और सियासत की गलियों से अनजान राबडी के लिये ये एक डरावना मंजर था । साथ ही पार्टी के अंदर ही सीएम पद का ख्वाब देख रहे तमाम नेताओं के विद्रोह का डर । तब राबडी ने अपने दोनों प्यारे सालों के हाथ में बिहार की कमान अघोषित रुप से सौंप दी । एक राजनीतिक अपराधी था तो एक शुद्द गंवार अपराधी । साधु तो राजनीति सीख गये थे लेकिन सुभाष जिसे लगता था कि कमाने का तरीका ..रंगदारी ,,अपहरण और ट्रांसफर ..पोस्टिंग से ही हो सकता है । इतना इन दो सालों ने गदर मचाया कि बिहार की जनता की नजरों मे लालू जो हीरो हुा करते थे ..जीरो की तरफ बढने लगे । मुझे याद है कि सुभाष यादव का कार्यक्रम अगर बिहार के किसी कोने में आपको लेना है तो सुभाष की ये शर्त होती थी कि आने के बाद उन्हें सिक्कों से तौला जाये । ८५ किलों का सुभाष यादव को अगर सिक्कों से तौला गया तो आप उसका दाम निकाल लिजीये । हां एक बात होती थी कि जिस किसी छुटभइये ने युवा हर्दय सम्राट सुभाष यादव का कार्यक्रम ले लिया वह उस एरिया या जिले का डान हो गया । अब वो सारी वसूली अफसर से लेकर दूकानदारों तक की इकढ्ठा करता था और उसमें से अपना शेयर काटकर सुभाष बाबू को पहुंचाया करता था । जनता की नजरों में राजद की सरकार दिन ब दिन गिरती जा रही थी । इधर नीतिश एनडीए में रहकर बतौर रेलमंत्री जो काम कर रहे थे वो लोगों को दिखने लगा । बिहार की जनता को विकास का पहला टेस्ट नीतिश ने रेल में काम करके चखाया । इसके बाबजूद लालू इतने कमजोर नही हुये थे । फरवरी २००५ मे विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश मिला ..नीतिश सरकार बनाने की जुगत लगा रहे थे ..अगर वो जोड तोडकर सरकार उस समय बना लेते तो उनका भी हश्र मदु कोडा सरखा होता । लालू को ये कतइ बर्दाश्त नही था क्यूंकि लालू को उस समय भी यह लग रहा था कि बिहार उनके परिवार की जागिर है । केंद्र में यूपीए के साथ सांठ-गांठ करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दी । राष्ट्रपति शासन के दौरान बूटा सिंह और उनके दो पुत्रों बंटी और लवली ने मिलकर वही काम किया जो साधु और सुभाष राबडी के लिये किया करते थे ..और यही कारण रहा कि अक्तूबर के चुनाव में जनता ने नीतिश के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की मुहर लगाकर लालू और पासवान को बाहर का रास्ता दिखा दिया ।

 ( जारी है )

Saturday, February 16, 2013

लेफ्ट का आखिरी किला या सरवाइवर ?


त्रिपुरा में विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों का भाग्य इवीएम मशीन में स्टोर्ड हो चुका है । बंगाल और केरल जैसे लेफ्ट रुल्ड स्टेट को कवर करने के बाद त्रिपुरा के राजनीतिक तापमान और मुद्दों को नजदीक से देखने का मौका मिला । शायद उत्तर पूर्व के राज्यों में इतना सभ्य , सुसंस्कृत और सुंदरता को समेटे शायद ही कोइ दूसरा राज्य हो। ६० विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में वामफ्रंट ( सीपीएम, सीपीआइ, आरएसपी, फारवर्ड ब्लाक ) और कांग्रेसनीत गठबंधन (कांग्रेस, एनपीटी, एनसीटी ) के बीच कडा मुकाबला है । मुद्दों की अगर बात की जाये तो लेफ्ट फ्रंट का दावा है कि उसने राज्य में अशांति और गुंडागर्दी को खत्म कर इस राज्य को ना सिर्फ शांति और अमन की पटरी पर लाया बल्कि विकास का लाभ समाज के निचले पायदान पर खडे लोगों तक पहुंचाया । पिछली बार ६० में से ४९ सीटें जीतनेवाली लेफ्ट फ्रंट का आदिवासी समाज के बीच भी गहरी पकड है । इसका सबूत है कि पिछले चुनाव में एसटी के लिये सुरक्षित २० सीटों में से १९ पर वाम फ्रंट ने अपना कब्जा जमाया था । इसके अलावा केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं को लागू करने में यह राज्य ना सिर्फ नार्थ-इस्ट राज्यों में नंबर वन है बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर भी ये राज्य टाप टेन पर है । हालांकि विपक्ष का मानना है परिवर्तन की हवा  का असर बंगाल के बाद यहां भी महसूस किया जा रहा है । कांग्रेस का कहना है कि राज्य में सिर्फ उसी का विकास हुआ जो सीपीएम के कैडर हैं । आम आदमी वहीं रहा जहां पिछले २० सालों से था । लेफ्ट की ओर से उनके केंद्रीय नेताओं ने राज्य में अपनी पार्टी के पक्ष में जोरदार प्रचार किया । वृंदा करात , सीताराम येचुरी मोहम्मद सलीम सहित मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपनी पार्टा के लिये खूब पसीना बहाया । वहीं कांग्रेस की ओर से केंद्रीय मंत्री दीपा दास मुंशी वित्त मंत्री चिदांबरम सहित कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी  अपनी ओर से खूब जोर लगाया । हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का प्रस्तावित दौरा रद्द होने के बाद राज्य कांग्रेस को फजीहत का सामना करना पडा । लेकिन बाद में राहुल गांधी ने ताबडतोड छः जनसभायें करके कांग्रेस के खेमें में उत्साह का संचार कर दिया । राजनीतिक पंडितों का कहना था कि अगर राहुल गांधी नही आते तो कांग्रेस का कबाडा निकल जाता । कांग्रेस के लिये सबसे परेशानी का सबब ये है कि १९८९ में उनकी सरकार यहां रही और राज्य में गुंडागर्दी और आतंक का बोलबाला रहा। इस दाग से कांग्रेसी अभी भी उबर नही पाये है और राज्य कांग्रेस ने सभाओं में कहा है कि अगर इस बार उनकी सरकार बनी तो उस गलती को दोहराया नही जाएगा । इसके अलावा लेफ्ट फ्रंट का एक और संगीन आरोप है कि कांग्रेस का गठबंधन उसी आएनपीटी से है जिसके सर्वेसर्वा बिजय रांकल कभी टीएनबी छापामार दस्ते के हेड हुआ करते थे । वहीं टीएनबी जिसने ८० और ९० के दशक में बंगाली समुदाय और आदिवासी समुदायों के बीच खून की होली खेली थी । हालांकि कांग्रेस का कहना है कि रांकल अब राजनीतिक पार्टी के हेड है और वर्तमान में विधायक भी है ।
राजनीतिक तापमान और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है इसका फैसला आगामी २८ तारिख को हो जाएगा लेकिन एक बात तय है कि पिछले १९ बरसों से लगातार सत्ता पर काबिज लेफ्ट को गद्दी से उखाडना कांग्रेस के लिये उतना आसान नही होगा । वैसे आम हिंदुस्तान से कटे इस राज्य में आपको भी आना चाहिये । शांति और भयमुक्त वातावरण के साथ अनेकों ऐसे पर्यटक स्थल है जहां आप अपने आपको प्रकृति से काफी करीब पायेंगे ।

Saturday, June 2, 2012

ब्रह्श्वेर मुखिया की मौत के बाद



मैं उस समय जहानाबाद में बेहद सक्रिय था । खेल संघो का अद्यक्ष और महासचिव होने के अलावा सांस्कृतिक क्रिया कलापों से भी जुडा था । बात १९९५ की होगी सवेरे मुझे पता चला कि बाथे में  रणवीर सेना के द्वारा ५० से उपर लोगों का नरसंहार कर दिया गया है । इसके बाद शुरु हुा नरसंहारों का अनंत सिलसिला ..शंकर बिगहा ..नारायणपुर ...रामपुर चौरम ..कहीं छिटपुट तो कहीं दिल दहला देने वाला । रातों रात रणवीर सेना उच्च वर्ग के किसानों के लिये राबिनहुड बनकर उभरा । प्रतिशोध में पिपुल्स वार ग्रुप और एमसीसी जो आपस में लडते लडते थक चुके थे ..रमवीर सेना से मुकाबला करने के लिये दोनों एक मंच पर ए गये । जहाना बाद के तत्कालिन डीएम प्रत्य अमृत बडी शिद्दत से इन घटनाओं का मुकाबला हर एक फ्रंट से करने की कोशिश कर रहे थे । हालांकि वो क्रिकेट के शौकिन थे ..नारायणपुर नरसंहार के समय सवेरे वो क्रिकेट प्रैक्टिस कर रहे थे ..इधर पत्रकारों ने खबर निकाल दी ..कि रोम जल रहा है और नीरो वंशी बजा रहा है । उनका तबादला कर दिया गया । उनके जगह पर डीएम अरुणीश चावला आये ( वर्तमान में मोंटेक सिंह अहलूवालिया के पीएस ) । जहाना बाद और अरवल के गांवों में जातिय वैमनष्य की धधकती चिंगारी के बीच इस शक्श ने शानदार मिसाल कायम की । रात रात भर ये उग्रवाद प्रभावित गांवों में लोगों के साथ सोते थे और उन्हें समझाते थे कि हिंसा का रास्ता छोडकर आप लोग मुख्यधारा में लौटो । वैसे युवा जो राह भटक कर हिंसा के आगोश में जाकर बंदूक थाम लिये थे उन्हें सरकारी ऋण की व्यवस्था करायी और उद्योग धंधा लगाने के लिये प्रेरित किया । पूरे ग्रामीण समूह को हिंसा और अराजकता के खिलाफ चावला लोगों को सडकों पर उतारने में सफल हुये । १९९९ मार्च में रमवीर सेना के द्वारा ३४ उची जाति के भूमिहारों को बडी ही बेरहमी से मार डाला गया । कहा जाता है कि एक टीचर जो उस गांव में २ साल पहले आये था और बच्चों को फ्री में शिक्षा देने के नाम पर उसने नक्सलियों के ऐजेंट के रुप में गांव में काम किया । एक एक घर का हिसाब किताब उसने दो सालों में ले लिया । कहा जाता है कि नरसंहार के घटित होने के बाद फिर दुबारा उसे गांव में नही देखा गया । प्रतिशोध में रणवीर सेना ने जहाना बाद औरंगाबाद सीमा से सटे गांव मियांचक में नरसंहार को अंजाम दिया जिसमें दुधमुंहे बच्चे और गर्भवती महिलाओं तक को नही बक्शा गया ।अगर रणवीर सेना के नेताओं का भाजपा और जदयू से संबंध था तो उस समय राजद के साथ एमसीसी खडी थी । ११९९ के लोकसभा चुनाव में राजद के अपराधिक छविवाले उम्मीदवार और लालू प्रसाद के करीबी सुरेंद्र यादव की हार जद यू के अरुण कुमार के हाथों हो गइ। अरुनीश चावला का सिर्फ इतना दोष था कि उन्होने सुरेंद्र यादव की गुंडा गर्दी नही चलने दी । हार से खिझकर लालू ने अरुनीश चावला का जहानाबाद से तुरंत तबादला करा दिया । जहानाबाद और अरवल के आसपास जितने नरसंहार हुये दोनो पक्ष रमवीर सेना या नक्सलियों ने उन्हीं गांवों को टारगेट किया जो शांतिप्रिय और भोले भाले थे । अगर रणवीर सेना कोि घटना को अंजाम देती थी तो पुलीस को वैसे नाम एफआइआर में दर्ज कराये जाते थे जो भूमिहार तो थे लेकिन पढते थे इंजीनियरिग और मेडिकल कालेजों में ..या वैसे युवा जिन्हें इस नरसंहार की राजनीति डसे कोइ लेना देना नही था । दोनों तरफ से बरबादियों की अंतहीन कहानी है ।आज इन क्षेत्रों में शांति और अमन बहाल होने की तरफ बढ रही थी तो ब्रह्श्वेर मुखिया की हत्या मे नये सिरे से
पुराने घावों को हरा करने की कोशिशें जो की जा रही है वो रास्ता बरबादियों का होगा ना कि आबाद होने का ।

Sunday, November 7, 2010

ऐतेहासिक होगा बिहार के लोगों का फैसला


पहले राष्ट्रमंडल खेल फिर ओबामा की भारत यात्रा ..और फिर एशियन गेम्स की चकाचौंध । शायद बिहार का चुनावी संग्राम मीडिया की सुर्खियां बटोरने में थोडा पीछे सा रह गया है। विभिन्न चैनलो और दिल्ली के पत्रकारों ने नीतिश कुमार की पुनः ताजपोशी कर दी है । पिछले दो महीनें से बिहार में हूं । बहुत सारे जगहों पर घूमा । यहां ऐसी कोइ लहर नही जो दर्शाती हों कि अमुक पार्टी को पूर्ण जनादेश देने के लिये जनता बेताब है । अगर पिछले २००५ के विधानसभा चुनावों की बात की जाये तो लालू के खिलाफ एक लहर सी पूरे प्रांत में चल रही थी जिसकी आंधी में सब उड गये और राज्य में एनडीए की सरकार बनी । वैसी आंधी या तूफान यहां देखने को नही मिल रहा है । हां एक बात जरुर नीतिश के चेहरे पर देखने को मिल रही है । सत्ता में वपसी को लेकर वह आश्वस्त ही नही बल्कि ओवरकन्फिडेंट नजर आते है । शाइनींग इंडिया के बाद शाइनिंग बिहार वाली चमक एनडीए के नेता और उनके समर्थक जरुर महसूस कर रहे है । टिकटों को लेकर एनडीए और जद यू में खूब घमासान मचा ..आखिरकार बात बनी और अब तो मात्र दो चरणों के चुनाव बाकि रह गये है । समीक्षकों का मानना है कि बढा हुआ वोट प्रतिशत नीतिश के गठबंधन को तो १५० से १७० सीट तक दिला सकता है या तो यह गठबंधन ८० - ९० सीटों तक सिमट जायेगा । २४३ सीटों पर अकेले चुनावी अखाडे में कूदी कांग्रेस अपने सीटों में कोइ खास इजाफा करने तो नही जा रही लेकिन इस पार्टी ने राजद-लोजपा और भाजपा जद-यू गठबंधन को खासा परेशान किया है । हालांकि राजद गठबंधन को कम ...लेकिन जद-यू गठबंधन को इसका ज्यादा नुकसान उठाना पड सकता है । जिस किसी सीट पर कांग्रेस ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर दमदार प्रत्याशी उतारा है वहां राज्य की दोनो प्रमुख गठबंधन को नुकसान उठाना पड रहा है । पिछले कुछ चुनावों से राजद लोजपा गठबंधन में यादव जाति के लोगों को पासवान पर भरोसा नही था उसी तरह पासवान जाति को यादवों पर भरोसा नही था ..शायद यही कारण था कि हाजीपुर से पासवान को हार का मुंह देखना पडा था । इस बार स्थितियां बदली हुइ है । दोनो जातियां गोलबंद है अपने प्रत्याशियों की जीत के लिये । इसका फायदा इन दोनो दलों को मिल सकता है । लालू ने ७५ सीटें लोजपा को दी है ..लोजपा ने दिल खोलकर सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है । लालू की पार्टी से अपेक्षाकृत सवर्णों को कम सीट दी गयी है । लालू से सवर्ण जातियों को चीढ हो सकती है लेकिन शायद पासवान से नही । जैसे जैसे चुनाव अंतिम दौर में पहुंच रहा है ..अन्य मुद्दों पर जातिय फैक्टर ज्यादा हावि हो रहा है । जद-यू के अत्यंत पिछडी जातियों में सेंधमारी को लेकर विपक्षी राजद - लोजपा गठबंधन खासे परेशान है ..वहीं नीतिश कुमार सवर्णों में सबसे आक्रामक जाति की नाराजगी से परेशान दिख रहे है ।अलपसंख्यक वोटों में भी बिखराव दिख रहा है ..लेकिन इसका ज्यादा प्रतिशत लालू वाले गठबंधन की ओर जा सकता है ..जहां जहां कांग्रेस की ओर से दमदार प्रत्याशी है अलपसंख्यकों का झुकाव कांग्रेस की तरफ भी देखने को मिल रहा है । बटाइदारी कानून का मुद्दा हालांकि यहां नजर नही आ रहा लेकिन साइलेंट वोटरों की संख्या को देखते हुये इस मुद्दे का मुर्दा हो जाना कहना गलत होगा । नीतिश सरकार के द्वारा अमन चैन ..रोड के मामले में सुधार ..लडकियों को साइकिल वितरण जैसे विकास के मुद्दे लोगो को खूब भा रहे है ..लेकिन अफसरशाही के हिटलरी रवैये ..गरीबों को दी जाने वाली खाद्यान में घोटाले जैसे मुद्दे नीतिश सरकार के खिलाफ जा रहे है ।शायद यही वजह है कि नीतिश अपनी चुनावी सभाओं में कह रहे है कि सत्ता में वापसी पर भ्रष्ट अपसरों को जेल ही नही भेजेंगे बल्कि उनकी संपत्ती को जब्त कर उसमें स्कूल खोलेंगे । लालू अपनी सभाओं में उंची जातियों से खूब माफी मांग रहे है कह रहे है कि आज सारे सवर्ण जाति के लोग समझ रहे है कि लालू मुंह का फूहड है दिल से नही और नीतिश दिल के काले है । कांग्रेस और राहुल गांधी पर भी खासकर जद-यू की तरफ से खूब आक्रमण हो रहा है ..शरद यादव का बयान गंगा में फेंक देने वाला ..पर खूब हंगामा हुआ। कांग्रेस का मानना है कि जद-यू के वोट वैंक में सेंधमारी से एनडीए के लोग बौखला गये है ।विश्लेषकों का मानना है कि सन २००३ के राजस्थान विधान सभा चुनावों में अशोक गहलोत से राज्य की जनता को कोइ नाराजगी नही थी । सर्वेक्षणों में वेस्ट मुख्यमंत्री के तौर पर गहलोत सबसे आगे थे लेकिन जब चुनाव के परिणाम आये तो भाजपा ने कांग्रेस का सूपडा साफ कर दिया । गहलोत के खिलाफ नही बल्कि उनके मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ जबरदस्त ऐन्टीइंकंबेंसी मत पडे । कुछ क्षेत्रों में ऐसी स्थिति देखने को मिली लेकिन राजस्थान जैसे हालात यहां नजर नही आ रहे है । कुल मिलाकर यहां लडाइ दिलचस्प है और २४ तारिख को जब मतों की गिनती होगी तो बिहार के लोगों का जनादेश अपने आप में ऐतेहासिक माना जायेगा । लोगों ने विकास को ही तरजीह दी या जातिय समीकरण का ही ख्याल रखा यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण रहेगा ।

Saturday, August 14, 2010

पिपली लाइव का असली हीरो नत्था नही राकेश है ?


फिल्म रिलीज होने के पहले बहुत कुछ कयास लगाये जा रहे थे ..किसान कर्ज माफी.... ग्रामीण भारत की समस्या आदि आदि इस फिल्म का थीम है । सही मायनों में यह फिल्म मीडिया और खासकर खबरिया चैनलों को खबर लेती दिखती है । भाजपा नेता प्रमोद महाजन को गोली लगने के बाद चार दिन तक जिंदगी और मौत से वो जूझते रहे ..आखिरकार उनका दुखद अंत हुआ। लेकिन उन चार दिनों तक खबरिया चैनलों के रिपोर्टर ..खबरनवीस कम डाक्टर ज्यादा हो गये थे। स्टिक लेकर लीवर का नक्शा बनाकर वो बताते थे कि गोली गोल व्लाडर को छूती हुइ निकली है ..इसलिये संभावना है कि प्रमोद महाजन की जान आसानी से बच जाएगी ...कोइ कहता था कि नही मेडिकल साइंस के मुताबिक गोली लगने के बाद टेटनस का खतरा हो गया है ..इसलिये उनकी जिंदगी खतरे में है । कुछ ऐसा ही उदाहरण नत्था के साथ इस फिल्म में है । आत्म हत्या के डर से उसे एक दिन में २० २० बार शौचालय के लिये जाना पडता है । एक बार शौचालय करने के बाद अहले सुबह नत्था गायब हो जाता है । उसकी ट्टी पर कुमार दिपक नाम के रिपोर्टर का विश्लेषण शुर होता है ...नत्था गायब है ..लेकिन वहीं ये जगह है जहां नत्था ने अंतिम बार अपना मल त्याग किया है ...इसका पाखाना सफेद है ..इसलिये जाहिर है कि नत्था जिस मनोस्थिती से गुजर रहा है उस हालत में ऐसा ट्टी होना लाजिमी है ..यह मनोचिकित्सकों का भी मानना है । चैनलों में एक जीव है जिसका नाम ..स्ट्रिंगर होता है । कस्बे का संवाददाता होता है । राष्ट्रीय चैनलों में कस्बों की खबर गाहे बगाहे ही फलक पर आती हों लेकिन जब कोइ बडी घटना कस्बे के आस पास हो जायें तो वही स्ट्रिंगर चैनलों के लिये अति महत्वपूर्ण हो जाता है। जहानाबाद जेल ब्रेक के दौरान एक स्थानिय स्ट्रिंगर ने ही उस खबर को ब्रेक किया था ..चैनल की टीआरपी भी बढी ..हालांकि चैनल ने उस स्ट्रिंगर को प्रश्स्ती पत्र के साथ साथ सुपर स्ट्रिंगर बनाया और नकद भी दिया । खैर ऐसा सबके साथ नही होता है । कुछ ऐसा ही पिपली लाइव में राकेश नाम का किरदार है जो स्थानिय अखबार का संवाददाता है। नत्था की खबर उसी के अखबार में सबसे पहले छपी । बाद में यह बडी खबर बन गयी ..राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक हिल गयी । सारे चैनलों के बडे सूरमा पिपली पहुंच गये । एक बडे चैनल की बडी अंग्रेजीदा रिपोर्टर भी पहुंची ...राकेश उन्हें ऐसीस्ट कर रहा था । उन्हीं के साथ साथ घूमता था और उनके चैनल की टीआरपी बढाने में मदद कर रहा था । कुछ दिन साथ रहने के बाद राकेश ने मोहतरमा को अपना सीवी बढाया ...मोहतरमा ने उसे अपने पास रखने को कहा क्यूंकि उसकी नौकरी से कहीं ज्यादा नत्था की स्टोरी थी । उस गांव में एक और किसान कर्ज और भूख से मर जाता है लेकिन वो चैनलों के लिये खबर का हिस्सा नही बन पाता है ...राकेश और मोहतरमा में वैचारिक तकरार भी इसको लेकर होता है ,,लेकिन मोहतरमा भारी पडती है क्यूंकि वो बडे चैनल की बडी रिपोर्टर है । पीटूसी करने के पहले पिपली के धूल धूसरीत स्थान में फिल्ड रिपोर्टिंग करते वक्त वह अपना मेकअप करना नही भूलती । नत्था कहां है ..राकेश की खोजी पत्रकारिता रंग लायी और नत्था का उसने पता लगा लिया । मोहतरमा दौडती है साथ में और चैनलों के रिपोर्टर अपनी ओवी के साथ उधर लपकते है । इसी बीच एक विस्फोट मे राकेश की मौत हो जाती है ...नत्था गुडगांव निकल पडता है दाढी मुंडवाकर मजदूरी करने ...लेकिन खबर यही बनती है कि विस्फोट में नत्था ही मर गया । सारा मसाला खत्म चैनल वाले के लिये ...ओवी और चैनलों के काफिले दिल्ली कूच कर जाते है ..मोहतरमा सबसे अंत में निकलती है और अपने सहयोगियों से पूछती है ...राकेश कहां है ...वो फोन भी रिसीव नही कर रहा है। गाडी में बैठती है और वो भी वापस दिल्ली स्टूडियो कूच कर जाती है । दिल्ली के पत्रकारों को स्ट्रिंगर कहे जाने वाले ये जीव उनकी ओर आशा और विश्वास भरी नजरों से देखते है ..सोचते है हरि मिल गया ..अब भवसागर पार कर जायेंगे ......लेकिन काम निकलने के बाद यही दिल्ली वाले पत्रकार उस जीव का फोन भी नही रिसीव करते....हां उसके विजुवल्स पर नक्सल बगैरह की स्टोरी बना डालते है ....और दिल्ली की झाडियों के बीच भाव भंगिमाएं बनाकर एक पीटूसी पेल डालते है । ...चैनल पर चलता है ..गुमला के जंगलों से कुमार दीपक की ये एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ..........

Tuesday, May 11, 2010

क्यूंकि मैं दूरदर्शन में हूं ।

हमारा दोस्त आशुतोष पाण्डेय है । दून में पढा है ..स्मार्ट भी है सिर्फ दिखने में ही नही बल्कि अपनी काबलियत से भी । कुछ दिन पहले वो एक साक्षात्कार में गया ..अंग्रेजी के लब्धप्रतिष्ठित चैनल में ..इंटरव्यू में उसके सामने थे उस चैनल के प्राइम टाइम एंकर या समझलिजीये बौस । सारे प्रश्नों का बेबाक उत्तर देने के बाबजूद उसे बताया गया कि आप दूरदर्शन में है इसलिये खबरें निकाल पाना आपके बस में नही है । आशुतोष ने मुझे बताया कि क्या खबरें निकालना सिर्फ निजी चैनलों के ही बस का है ? खबरें हम दिखाते है और हमारे चैनल के लोग मेहनत भी करते है हम खबरों में मसाले का छौंक नही दे पाते है ..उसे सनसनिखेज नही बना पा पाते है ..हम टी आरपी के खेल से भी अलग है ...हम थोडा पिछे रह जाते है लेकिन खबर पक्की जब तक नही हो जाये नही दिखा पाते है । खबरों के छौंक का एक छोटा उदाहरण हम आपसे शेयर करना चाहते है । भारत अमरीका परमाणु करार के मामले में राजनीतिक सरगर्मीयां अपने चरम पर थी । वाम पार्टियों का एक छोटा सा मूवमेंट भी खबर का एक अहम हिस्सा बन चुका था । एक शाम खबर आयी कि प्रकाश करात १० जनपथ में कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने आ रहे है । १० जनपथ में उस समय संतन की भीड जुट गयी थी पूरे लाव लश्कर के साथ । तमाम तरह के लाइव इनपुट चैनल के महान रिपोर्टर अपने संस्थान के लिये कर रहे थे । ६ बजे का समय शायद निर्धारित था सीपीएम महासचिव का कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने का । ९ बज गये थे ..लेकिन प्रकाश करात का कोइ अता पता नही था । प्राइम टाइम में एक लाइव इनपुट बडे चैनल के बडे रिपोर्टर ने शुरु किया । एंकर ने पूछा लेटेस्ट अपडेट बताइये । रिपोर्टर ने अपने स्पीच में जोरे बाजू का इस्तेमाल करते हुये ब्रेकिंग खबर दिया कि प्रकाश करात आये तो थे कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने लेकिन वो पिछले दरवाजे से आये और मैडम सोनिया गांधी से मिलकर चले गये । रात के ११ बज गये थे सारे चैनलों ने वाइंड अप कर लिया । हम भी वाइंड अप हो गये । उस दिन मुझे पता चला दूरदर्शन और निजी चैनल का फर्क । मैने सोचा कि इस रिपोर्टर को शायद प्रकाश करात ने ही बताया होगा कि भइया हम पिछले दरवाजे से मिलकर चले गये । खबरों की खबर रखने वाले से हमारा क्या मुकाबला । बात आयी गयी हो गइ .. एक दिन के बाद प्रकाश करात की गोपालन भवन में पीसी थी । सारे अखबारनवीस और चैनल के बडे बडे रिपोर्टर पहुंचे थे । पीसी के बाद सवाल जबाब का सिलसिला शुरु हुआ। सब लोग थक गये अपने अपने सवाल पूछ कर ..मसलन आप लोग भौंकते है काटते नही ...बगैरह वगैरह । मुझे तो पिछला दरवाजा वाला सवाल दिमाग में घूम रहा था । मैने पूछ दिया कि कल आप १० जनपथ में पिछले दरवाजे से कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने गये कृप्या आप बतायें एटमी करार पर क्या बात हुइ । प्रकाश करात ने कहा कि मैं कल दिल्ली में था ही नही । मैने अपना माथा पीट लिये । तब मुझे अहसास हुआ कि आखिर खबरों के निकालने की तरकीब क्या होती है । हाल ही में एक दिन गोपालन भवन में हरिकिशन सिंह सुरजीत पर एक बुकलेट का विमोचन था प्रकाश करात , सीताराम तथा कामरेड सुरजीत की पत्नी भी उपस्थित थी । इसी बीच हमारे दूरदर्शन के एक पत्रकार दोस्त ने फोन किया कि आलोक जी कानू सन्याल ने आत्म हत्या कर ली है हो सके तो इसपर एक बाइट ले लिजीये । निजी चैनल के एक बडे रिपोर्टर से हमने वह बात उन्हे कही कि प्लीज ये सवाल पूछिये ...उन्होने कहा कि हु इज कानू सान्याल ? दोस्तों तों वो बीट रिपोर्टर थे उसमें भी बडे चैनल के । यहां आप कतइ ये नही समझेंगे कि मैं अपनी शेखी बघार रहा हूं ... अरे हम तो रिपोर्टर कहलाने के तो काबिल ही नही है ...इसलिये कि दूरदर्शन में है ।


Tuesday, March 23, 2010

भूत पड गया लालाजी के चक्कर में - एक लोककथा


कायस्थ लोग कलम के तेज या कहे धनी होते है । बिहार में कहावत है कि क्षत्रिय के तलवार के धार से भी बडी धार होती है लालाजी के कलम में । लाला जी की नयी नयी शादी हुयी थी । पढे लिखे थे लेकिन कहीं नौकरी नही थी । एक आध साल के बाद उनकी धर्मपत्नी लगीं लाला जी को कोसने । रोज उलाहना देती कि बाबूजी कइसन करमकीट से वियाह कर दिहलन । पत्नी का ताना सुनते सुनते लाला जी परेशान हो उठे । एक दिन अपना कलम दावात उठाया और सोचे कि चलो नही कहीं कुछ रोजगार मिला तो बच्चों को पढाकर छोटा मोटा स्कूल खोल देंगे । अहले सुबह अपने घर का त्याग कर निकल पडे रोजगार की तलाश में । गर्मी का दिन था । चलते चलते भरी दुपहरिया में लाला जी पसीने पसीने हो गये । सुकुमार तो थे ही । दोपहर में एक पेड के निचे घर से बंधे हुये पोटली का खाना खाया । पेड की छांव में लालाजी को निंद आ गयी । खर्राटे लेकर सो गये । वह पेड भूतों का बसेरा था । शाम हुइ भूत जब लौटकर पेड पर वापस आये तो देखा कि एक आदमी सो रहा है । भूतों के तो पौ बारह हो गये उनमें से एक नौजवान भूत ने कहा ..अहा ..आज तो इंसान का ताजा खून पीने के लिये मिलेगा । तभी एक बुजुर्ग भूत ने अपने साथियों को समझाया ...अरे सब जानते है कि यह पेड भूतों का बसेरा है ..यहां तो कोइ इंसान दिन में भी नही फटकता । जरुर कोइ असाधारण इंसान है । बुजुर्ग भूत ने लालाजी को जगाया । लालालाजी की निंद टूटी तो आसपास भूतों के काफिले को देखकर उनके तो प्राण ही सूख गये । लालाजी ने सोचा मरना तो है ही क्यूं ना कुछ अक्ल का इस्तेमाल किया जाये । बुजुर्ग भूत ने लाला जी को डपटते हुये पूछा ..अरे इंसान के बच्चे तुम कौन हो ..तुम्हें डर नही लगा कि ये पेड भूतों का बसेरा है । लालाजी ने हिम्मत का प्रदर्शन करते हुये कहा ..हमें क्यूं डर लगेगा तुम लोग अब अपनी सोचों । बुजुर्ग भूत थोडा सहमा और बोला ..आखिर क्यूं ..। लालाजी ने कहा कि मैं इंद्र देवता का क्लर्क हूं ..मुझे देवता ने यहां भेजा है कि जाओ धरती पर और इस पेड के निचे रहने वाले भूतों का सर्वे करो । ये भूत निकम्मे और कामचोर है पूरी गिनती कर जल्द ही इन्हें खेतों में काम पर लगाओ। बुजुर्ग भूत ने लालाजी के पांव पकड लिये । हे किरानी महाराज सदियों से हमलोग स्वच्छंद जीवन जीते आये है । हमें ऐसी सजा नही दिजीये । ले देकर मामला रफा दफा किजीये । आप जो कहें हम करने के लिये तैयार है । लालाजी ने मन ही मन सोचा कि तीर सही निशाने पर लगा है । ठिक है देवता तो हम पर पूरा विश्वास करते है । चलिये रोज २० क्विंटल अनाज घर पहुंचा दिजीये मैं इस मामले को अपने रिस्क पर सुलझाने की कोशिश करता हूं। लालाजी घर लौट आये । बस अगले दिन से रोज २० क्विंटल अनाज लाला जी के घर रोज पहुंचने लगा । लालाइन को भी लगा कि बाप रे बाप हम झूठ ही अपने मर्दाना की काबलियत पर शक करते थे । लालाजी के घर अब खुशियों की बारिश होने लगी । यह सब देखकर लालाजी के पडोसी व्यापारी भाइ को नही सुहाया । सोचा कि लाला जी कि इस सफलता के पिछे क्या राज है ? व्यापारी ने अपनी पत्नी को जासूस बनाकर लालाइन से इसका भेद जानने के लालाजी के घर भेजा । लालाइन सीधी साधी थी सारा राज व्यापारी की पत्नी को बता दिया । व्यापारी ने सोचा अच्छा बेटा तो तुम्हारी सफलता का ये राज है । उसी दिन शाम को व्यापारी भाइ चल दिये उस भूतों वाले पेड के निचे । जानबूझकर मटियाकर सो गये । भूत आये । व्यापारी को जगाया । व्यापारी ने वही डायलाग बोला जो लालाजी ने भूतों से कहा था । भूत एक साथ जब डपटे तो व्यापारी महोदय के प्राण सूख गये । उन्होने सच्चाइ बता दिया । भूतों ने व्यापारी की खूब पिटाइ की और दंडस्वरुप उन्हें ये कहा कि तुम लालाजी को रोज २० किलो घी दंड के रुप में पहुंचाओ । व्यापारी भाइ मान गये । जाकर लालाजी से आरजू मिन्नत की तो लाला जी ५ किलो डेली पर मान गये । अब तो लालाजी के दिन और मजे से कटने लगे । एक दिन बुजुर्ग भूत ने अपने साथियों से मंत्रणा की कि कहीं ये लालाजी हमलोगों को वेवकूफ तो नही बना रहा है । अगले दिन बुजुर्ग भूत अपना चोला बदलकर कुत्ते के भेष में लालाजी के यहां पहुंचे । लालाजी के कुत्ते का नाम गिरधारी था ..लालाजी खाना खाने के बाद अपने कुत्ते को गिरधारी आ आ करके बुलाया । संयोग से बुजुर्ग भूत का नाम भी गिरधारी था । उसकी तो सिट्टी पिट्टी गुम । कुत्ते का भेष त्यागकर बुजुर्ग भूत लालाजी के चरणों में गिर पडा । हे किरानी महाराज मुझे माफ कर दिजीये मैने बेवजह आप पर शक किया । लालाजी को समझ में आ गया कि भाग्य ने गेंद तो फिर मेरे पाले में फेंक दिया है । लालाजी ने बुजुर्ग भूत से कहा देखो भाइ तुम्हें तो इसके लिये मुझे कडी से कडी दंड देनी चाहिये लेकिन चलो मैं तुम्हें बक्श देता हूं । हां तुम ऐसा करों कि रात में तुमलोगो मेरे गोदाम में आओं और जो कच्चा अनाज तुम लोग दे आते हो उसकी रोज पिसाइ करों । बुजुर्ग भूत ने एवमअस्तु कहा और वापस अपने पेड की ओर लौट आया ।

Friday, March 19, 2010

नजर सुरक्षा चक्र -- इलाज से बढिया ऐहतियात बरतें


नाम- मिसेज देसाइ ...राजस्थान की रहने वाली ..इनके पति बहुत बडे व्यवसायी है । दस साल पहले इनकी बर्तन की एक छो‍टी सी दूकान थी । अपनी मेहनत और कर्म के बलबूते आज इनकी बर्तन की तीन तीन बडी फैक्टरियाँ है । सब कुछ ठिक ठाक चल रहा था । एक दिन इनकी चाची सास इनके घर आ गयी ..बस बोलना शुर किया ..बाप रे बाप कितनी तरक्की तूने कर ली है ..ऐसा व्यापार ..इतने पैसे ..तेरी पत्नी के इतने गहने ..और एक मेरे पति जो सिर्फ गवांना जानते है बनाना नही । तभी चाची की दोनो आंखों से चिंगारी निकली ( ठिक वैसा ही जिस तरह रामायण सीरियल में राम के वाण चलने के बाद रावण तक पहुंचते पहुंचते ( रे यानि किरण का रुप लेकर पहुंचती थी ) और उसके बाद मिस्टर देसाइ की आँखो मे जाकर चुभ गयी । एक स्पेशल इफैक्ट होता है और मिस्टर देसाइ के शरीर का अग्र भाग बिल्कुल लाल हो जाता है । बस क्या था ..उसी दिन से मिस्टर देसाइ उखडे उखडे रहने लगे । धीरे धीरे उनका व्यापार भी उजडने लगा । पूरा परिवार परेशान हो उठा । भला हो मिसेज देसाइ का जिन्होने बिना अपनी पति के अनुमती के बगैर इस नंबर पर संपर्क किया ( ९३१२९२२६२२६) फिर एसएमेस किया ( एनएसके ५६७६७) और उसके बाद उन्हें मात्र २३७५ रुपये में मिला नजर सुरक्षा चक्र । दिव्य ऋषी संस्थान के वैग्यानिकों के द्वारा बनाया गयी एक ऐसी माला जिसके पहनने के बाद आपके इर्द गिर्द वह माला पोजीटिव एनर्जी क्रियेट करता है और आप पर डाले गये निगेटीव एनर्जी की काट करता है । माला के पहनते ही मिस्टर देसाइ का जीवन ही बदल गया और उनका व्यापार भी अपने पुराने ढर्रे पर आ गया । चाची सास आज भी उनके पास आती है और निगेटीव एनर्जी क्रियेट करती है लेकिन वाह रे नजर सुरक्षा चक्र का कमाल ..समझिये नजर लगानेवाली की ऐसी तैसी । पुणे की रहनेवाली पेशे से शिक्षिका बरखा गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ उनकी भाभी ने बरखा की शादी काट दी । नजर सुरक्षा का लाकेट पहनते ही उनकी भी दुनिया बदल गयी । महामंत्रों के जाप इस लाकेट में इनबिल्ट है । नजर सुरक्षा ही है आपके भाग्य की चाबी ..और हां ३० दिनों के अंदर इस लाकेट ने अपना काम नही किया तो कंपनी आपसे ली हुइ सहयोग राशी भी वापस कर देगी । जल्दी किजीये क्या पता कोइ बुरी नजर आपका पिछा कर रही है । बचपन में हमारी मां नवरात्री के दिनों में हमारी नाभी पर काजल का टीका लगाती थी ...बुरी नजरों से बचाने के लिये ..गाय भैंस से दूध का व्यापार करने वाले अपने गौशाले में बंदर रखा करते है बुरी नजर से बचाने के लिये । २० साल पहले बिहार में एक अफवाह उडी कि भइया अपने घर पर पंजा छाप के लेबल की छपाइ करों नहीं तो घर की ऐसी तैसी हो जायेगी । सारे घरों पर पंजे का लेबल छप गया बुरी नजरों से बचने के लिये । कुछ वर्षों पहले अचानक गणेश जी दूध पीने लगे । हालांकि उन्हीं दिनों एक डेमों में एक प्रसीद्ध वकील ने गणेश जी को शराब भी पिला डाली । दूकानदार जब शाम को अपनी दूकान बंद करते है तो बंद शब्द का प्रयोग नही करके बढाना शब्द का उपयोग करते है । रवि शास्त्री ने अपना एकमात्र दोहरा शतक आष्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में लगाया । उस मैच में जो जुराब उन्होने पहनी थी उसे लगाचार फटे चिथडे हालात में भी दस साल टोटके के तौर पर पहनते रहे ।तेंदुलकर अच्छी पारी खेलने के बाद और कपिलदेव क्रिज पर पहुंचने के पहले सूर्य भगवान को अभिनंदन करना नही भूलते । ऐसे में मेरी सलाह है आप सब टोटके को छोडकर नजर सुरक्षा चक्र को अपनाये कोइ विघ्न आपके पास नही फटकेगा ।

Thursday, December 10, 2009

एक नक्सली की कहानी- पार्ट-२


अब बिलाइ मियां अपने बौद्धिक अंदाज में अपना दर्शन मेरे सामने बयां कर रहे थे । मैने कहा बिलाइ मियां जब तक वैचारिक क्रांति आप लोगों के अंदर समावेश नही करेगी तब तक आप अपने मकसद में कैसे सफल होंगे । बिलाइ ने माओ-त्से-तुंग का डायलाग बोला क्रांति बंदूक के नली से होकर गुजरती है । खैर दस्ता प्रमुख ने बोला आलोक जी अब हमारा पडाव यहां से चल रहा है ..हमने पूछा कि कहां ..बोले मुझे भी नही मालूम । अब बिलाइ मियां बहुत मशहूर हो चुके थे । उनके नाम से ही बडे बडे अपराधी थर्राने लगे थे । खैर बिलाइ इमानदार थे और शोषितों के लिये उन्होने हमेशा संघर्ष किया । एक दिन अपने बाल बच्चों से मिलने अपने पैतृक घर पहुंचे पुलीस के भदिये ने इसकी खबर प्रशासन को दे दी । बिलाइ मियां अरेस्ट हो गये इनके साथ एक और नामी नक्सली पकडा गया । पुलीस की नजर में ये नक्सली कुख्यात होते है क्यूंकि बारुदी सुरंग बिछाकर नक्सली संगठन कितने ही पुलीसकर्मिंयों को मौत की निंद सुला चुके है । इन दोनो नक्सली नेताओं के साथ पुलीस ने बेइंतहा जुल्म किये । बिलाइ के साथी को पुलीस ने इतना प्रताडित किया कि उसकी मौत पुलीस हिरासत में हो गइ । मीडिया ने बहुत हो हल्ला किया ..मानवाधिकार संगठन भी काफी चिल्लाये लेकिन जहां तक मुझे जानकारी है न्याय अभी भी कोसों दूर है । बिलाइ की भी बहुत पिटाइ हुइ । कइ मुकदमों मे संलग्न है इस बीच उनका पूरा परिवार दाने दाने को मुहताज हो गया ..और उस भू माफिया ने ... कहा जाता है कि नक्सली संगठन को मोटी रकम देकर मामले को रफा दफा करा लिया । जिस जमीन के हक को लेकर बिलाइ ने बंदूक उठायी थी ..उसके जमीन पर उसी भू माफिया का आज एक सुंदर सा मार्केटिंग काम्पलेक्स बिलाइ मियां की जमीन पर चमचमा रहा है ।
( समाप्त)

Tuesday, December 1, 2009

एक नक्सली की कहानी

शरीर से वलिष्ठ उपर से रौबदार मूंछे । ऐसा लगता था कि शोले का गब्बर है बिलाइ मियां । बचपन में घरवालों ने उनका यहीं नाम दे दिया था । आंखे भूरी होने की बजह से शायद। वैसे बिहार में आपको अमरिका सिंह भी मिल जायेंगे और खदेरन सिंह भी । किसी गांव का नाम वहां इंगलिश पर भी मिल जायेगा । खैर बात हो रही थी बिलाइ मियां की । बिलाइ मियां बचपन से ही खुराफाती थे । बम बगैरह बना देना उनके बांये हाथ का खेल था । वो इसलिये कि हिंदु मुस्लिम फसादात को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ऐहतियात के तौर पर अपने कौम के लिये ऐसा भला काम कर देने की जिम्मेदारी उन पर आन पड जाती थी । खैर लेकिन है वे बडे शरीफ इंसान । तारेगना के फुटपाथ पर उनकी एक दूकान हुआ करती थी । ताले ,चाबी , लालटेन और टार्च के मरम्मत की । बहुत मशहूर टेक्नोक्रेट थे । हर ताले की चाबी और टार्च की गयी रौशनी को वापस बुलाना उनके बायें हाथ का खेल था । बहुत मशहूर थे अपनी कारकर्दगी के लिये । जाति से वो रंगरेज थे । यानि कपडे को रंगीन बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी पेशा था । मुझे याद नही कि कितने वर्षों से उनका परिवार तारेगना में रह रहा था । बात सन १९९५ की है । एक स्थानिय भू माफिया ने बिलाइ मियां की जमीन के साथ पूरे १२ कठ्ठे जमीन को अपने नाम करा लिया । बिलाइ मियां के घर के आगे बंगलियां ( जी हां यही नाम था ) उसका होटल था । उसका मालिक भी वही भू माफिया हो चुका था । जो भी लोग उस जमीन से वास्ता रखते थे भू माफिया के डर से भाग चले लेकिन बिलाइ मियां सीना तानकर इका विरोध करते रहे । एक रात को वहां एक आदमी की हत्या हो गइ । वो आदमी बंगलिया होटल मालिक का बेटा था । हत्यारे ने गफलत में बंगलिया के बेटे की हत्या कर दी रात के अंधेरे में उसे लगा कि बिलाइ मियां साइकिल से अपने घर जा रहा है । उस दिन का सबेरा बिलाइ मियां के लिये खौफ का मंजर लेकर आया उसने अपनी दूकानदारी बंद की .. भू माफिया से लडने की ताकत नही थी उसमें । बदले की आग दिमाग में लिये हुये वो पहुंच गया नक्सल संगठन की शरण में । चार जवान बेटियां और अपनी पत्नी को छोडकर बिलाइ मियां कुछ ही दिनों में नक्सल संगठन के दस्ता प्रमुख बन गये । दस्ता यानि नक्सलियों का वो विंग जिसकी कमाइ पर नक्सल संगठन जिंदा है । बिलाइ मियां अब माओ और क्रांति की बात करने लगे थे । २० -२५ मुकदमों के मुदालय भी बन चुके थे । एक बार मैं अपने दोस्त की बहन की शादी के सिलसिले में तारेगना के एक सूदूर गांव में पहुंचा । दोस्त मुसलमान था । बडका मांस ( गाय का ) वहां बन रहा था मैने नही खाया । इसी बीच एक आदमी मेरे पास आया और बोला फलां नक्सली संगठन के दस्ता प्रमुख आपको बुला रहे है । मेरी तो हवा निकल गइ । सोचा नही जाउंगा तो यहीं मारा जाउंगा दिमाग पेशोपेश में क्यूं बुलाया क्या मैने कुछ नक्सल मूवमेंट के बारे में तो कुछ नही बोल दिया था । परेशान और हैरान जब उस व्यक्ति के साथ उस स्पाट पर पहुंचा तो वहां दस्ता प्रमुख और कोइ नही बल्कि बिलाइ मियां अपने दस्ते के साथ खाना खाकर ताडी ( इसे आप स्काइ जूस समझे ) पी रहे थे । आइये आलोक बाबू स्वागत है । मैनें कहा अरे मिस्टर बिलाइ जी ...ये सब क्या है चालीस के करीब हथियार बंद लोग जिसमें ३५ के करीब सो रहे थे और पांच लोग अप डाउन अप डाउन कर रहे थे । बिल्कुल मिलिट्री की तरह । लेकिन किसी के पास भी तन पर ढंकने के लिये पयार्प्त कपडे नही थे । मैने पूछा कि बिलाइ यह जो १४ साल का लडका है नक्सली क्यूं बन गया ...दबंगों ने इसके पूरे परिवार को मार डाला जमीन हडपने के खातिर इसके पास उन लोगों से लडने की औकात नही थी इसलिये ये नक्सली हो गया ...मैनें फिर कहा कि ये बालक जिसके दूध के दांत भी ठिक से नही उगे है ...इसकी बहन के साथ दबंगों ने बलात्कार किया और बहन ने खुदकुशी कर ली । इसी तरह की कहानी सभी लोगों की थी । खुद में इतना ताकत नही था कि वो उन दबंगो से लड सकें इसलिये थाम लिया हाथ नक्सलपंथ का ।
( शेष जारी है । )

Tuesday, August 25, 2009

आनंद जैसी फिल्में बार बार नही बनती । पार्ट-१


गीतकार गुलजार की ७३ वीं वर्षगा‌ठ पर विभिन्न चैनल अलग स्टोरी चला रहे थे । एक चैनल में आनंद का वो गीत जिंदगी कैसी है पहेली ...चल रहा था ..पैकेज में बताया जा रहा था गुलजार का ये अमर गीत आज भी दिल की गहराइयों को छू जाता है । हकीकत है कि इस गाने के गीतकार योगेश है ..इसी फिल्म का एक और गीत कहीं दूर जब दिन ढल जाये..के लेखक भी योगेश ही है । मैने तेरे लिये ...ना जिया जाय ना ..और मौत ती एक पहेली है के गीतकार गुलजार है । हालांकि इन सभी गीतों का संगीत अमर संगीतकार सलील चौधरी ने दिया है । १९७२ में बनी इस फिल्म के सारे किरदारो को देखकर ऐसा लगता है कि वे सब हमारे और आपके बीच के हों । पहले इस फिल्म के लीड रोल के लिये महमूद और किशोर कुमार को ह्रषिकेश मुखर्जी ने चुना था । इस सिलसिले में जब ह्रषि दा किशोर कुमार के आवास पर पहुंचे तो दरवाजे पर खडे चौकीदार ने उन्हे वहां से भगा दिया । दरअसल किशोर कुमार का एक स्टेज कार्यक्रम किसी बंगाली सेठ ने करवाया था । जब पैसे की भुगतान की बात आयी तो बंगाली सेठ ने तयशुदा पैसे नही दिये । किशोर कुमार के बारे में ये सबको पता है कि वो अपने मेहनताने में से एक रुपया भी कम नही लेते थे ..यहां तक कि कटे फटे नोट भी वो स्वीकार नही करते थे । उस बंगाली सेठ से किशोर दा की मारपीट भी हो गयी थी थी । तब किशोर दा ने अपने दरबान को ये स्पस्ट आदेश दे रखा था कि किसी भी बंगाली को घर के अंदर नही घुसने देना । जैसे ही ह्रषि दा ने अपना नाम मुखर्जी बताया दरबान ने उन्हें खदेड दिया । ह्रषि दा इस घटना से इतना आहत हुये कि उन्होने निश्चय किया कि इस फिल्म में किशोर कुमार को तो कभी नही लेंगे। बाद में महमूद से भी बात नही बनीं और इस फिल्म में दो नये अदाकार अमिताभ और राजेश खन्ना को ह्रषि दा ने लिया ।बाबू मोशाय राजकपूर ऋषि दा को कहा करते थे उसी से प्रभावित होकर निर्देशक महोदय ने बाबू मोशाय का करैक्टर आनंद में रखा । बाबू मोशाय उस दौर में एक प्रतीक बन गया था राजेश खन्ना और अमिताभ के संदर्भ में ।
अगली बार आनंद से जुडी कुछ और बातें )

Tuesday, July 28, 2009

हमारे जनप्रतिनिधी




( ये दोनो प्रसंग सिनापा जी ने हमें भेजा है ॥आपके सामने रखने में मजा आयेगा । )



( एक)


बिहार में संविद की सरकार गिर गयी थी । शोषित दल की सरकार बनी थी । उस मंत्रीमंडल में एक मंत्री किसी मठ के महंत थे । महंथ जी के पास एक फाइल आयी । फाइल चूंकी महत्वपूर्ण थी इसलिये सचिव महोदय महंथ जी चैम्बर में स्वंय चले गये और महंथ जी से कहा कि महोदय एक बहुत ही महत्वपूर्ण फाइल हमने आपके यहां नोट देकर भेजा है । कृप्या इस फाइल पर पर कारवाइ करके वापस लौटाया जाय। सचिव के जाने के बाद मंत्री ने फाइल मंगवाया । उसको उलट पुलट कर देखा और रख दिया । थोडी देर के बाद एक सहायक आया और मंत्रीजी से बोला कि हुजूर फाइल सचिव महोदय साहब मंगवायें है । मंत्री जी ने फाइल को फिर उलट पुलट कर देखा और फिर वहीं रख दिया । फाइल चूंकि अर्जेन्ट थी इसलिये सचिव महोदय स्वंय महंथ जी के कमरे में आ गये और फाइल के लिये याचना की । महंथ जी विफरते हुये बोले ॥बार बार फाइल के लिये आदमी भेज रहे है ? फाइल उछालकर बोले ...कहां है नोट ? कांग्रेसियों को आप लोगों ने बहुत ठगा है ॥आप हमें ठगने चलें है । हम महंथ है ..ठगाने वाले नही है ...। कहां आपने फाइल में नोट दिया है और बार बार तगादा किये जा रहें है । पहले तो सचिव महोदय हक्का बक्का रह गये । तुरंत बात उनकी समझ में आ गयी । सचिव महोदय ने महंथ जी को समझाया कि फाइल पर लिखने को नोट देना कहा जा ता है । मंत्री जी सचिव महोदय का मुंह ताकते रह गये । उन्होने कहा महाराज ऐसा था तो पहले ही बता देते ना कि दस्तखत करना है । बार बार नोट नोट क्या चिल्ला रहे थे ।सचिव महोदय संचिका लेकर बाहर निकल गये और पहला काम किया कि जिस वाकये को प्रधान सचिव को सुनाया बाद में बात फैली तो अखबारों में भी छपी ।




(दो)


ललित नारायण मिश्रा समस्तीपुर बम - विस्फोट में घायल हो चुके थे । समस्तीपुर से दानापुर लाने के क्रम में उनकी मौत हो गयी । अब्दुल गफूर सरकार ने घोषणा की कि जो भी एल एन मिश्रा के मौत के रहस्य का अनावरम कर देगा उसे पच्चीस हजार रुपया नगद इनाम और पुलीस के आदमी को प्रमोशन दिया जाएगा । समस्तीपुर के तत्कालिन एसपी ने रहस्य का खुलासा कर दिया । घोषणा के अनुसार गफूर कैबिनेट ने उक्त एसपी को नगद इनाम सहित डीआजी बनाने की घोषणा कर दी । दूसरे ही दिन गफूर मियां को उनके पद से हटा दिया गया । जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री बन गये । उन्होने पहला काम किया । गफूर मियां के मंत्रीमंडल के निर्णय को तत्काल निरस्त कर दिया और मामले को सीबीआइ को सौंप दिया । मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद अब्दुल गफूर मुख्यमंत्री आवास से दो अटैची हाथ में लेकर सडक पर आयें और रिक्शा पकडकर अपने निजी आवास में पहुंचे । उनका ड्राइवर अनुरोध करता रहा लेकिन गफूर साहब ने कहा कि कार मुख्यमंत्री का है और मैं अब मुख्यमंत्री नही रहा ।

Thursday, July 23, 2009

सूर्यग्रह्ण के तीन मिनट


(अभी मैं तारेगना में ही हूं। सूर्यग्रहण के बाद तारेगना को सब लोग जान गये है । आर्यभट्ट् के बारे में इसी शहर के रिसर्चकर्ता सिद्शेश्वर नाथ पांडेय हों या यूपी के प्रताप गढ में जन्में और तारेगना को अपनी कर्म स्थली बनाने वाले नारायण जी हों । नारायण जी एक बहुत अच्छे कवि भी है ..२२ जुलाइ को तारेगना के पूर्ण सूर्यग्रहण को देखा और एक छोटी कविता को हमारे पास भेजा है । हम उसे प्रकाशित कर रहें है । )


कौतुक विस्मय ललक पल पल छलक छलक ।

अद्भुत स्पन्दन ...अभिनंदन अभिनंदन शुभ शुभ पूर्ण सूर्यग्रहण ... अभिनंदन
अपलक नयन गगन गगन

छितीज चरण चरण

पल पल परिवर्तन

मन्द मन्द सिहरन सिहरन ,

सुन मौन गगन का उद्भोदन

कर वंदन ..... अभिनंदन अभिनंदन

भय-मान भयानक कृष्णावरण

पूर्ण प्रकाश वृत-चन्द्रशयन

वृन्द विहग सब विस्मित- शंकित सुन पद्चाप

काल - व्याल सन्निकट मरण

पर पायें तीव्र त्वरण अभिनंदन अभिनंदन ।

गर्भ ब्रहांड व्यवस्थित कालक्रम गति नियम ।

अनवरत स्वंय अनुपालन व्यतिक्रम

प्रमाण प्रत्यछ पवन ॥

विभु को कर हर प्राण नमन

अभिनंदन अभिनंदन ॥ ॥

शुभ शुभ पूर्ण सूर्यग्रहण

२२-७ के बाद का तारेगना

सारे विश्व की नजर तारेगना पर गडी थी । प्रकृति को ये रास ना आया ..२१ की शाम को वहां खूब बारिश हुइ..रात १२ बजे तक पूरा आकाश बादलों से ढका था ..सुबह के तीन बजे आसमान बिल्कुल साफ ..स्पेस के पंडितों के लिये ये लम्हा आनंददायी था । लोग खुश थे कि आज सदी की ये विशेष खौगोलिय घटना का आनंद वे मजे से ले सकते है । सुबह के साढे चार बजनेवाले थे कि अचानक बादलों का घेरा एक बार फिर आकाश में छाने के लिये व्याकुल हो उठा और देखते ही देखते बादलों के पूरे साम्राज्य ने आकाश को फिर से ढक लिया । उसके बाद उस मनहूस बादल ने तो पूरा खेल ही बिगाड दिया ...६ बजकर २४ मिनट का वो भी दृश्य सामने आया जब सुबह की लालिमा धीरे धीरे गोधूली वेला की ओर जाती देखी गयी..और अचानक एक बार फिर पृथ्वी रात के अंधेरें में लुप्त हो गइ ..बडा ही विहंगम दृश्य था ..तापमान अचानक ४ से ५ डीग्री निचे चला गया ..वहां उपस्थित ढाइ लाख लोगों ने इस घटना का भरपूर मजा लिया ।विग्यान जगत के लोग निराश जरुर हुये लेकिन भारत से बाहर के लोगों से हमने पूछा कि आज का ये शो आपको कैसा लगा ..उनका जबाब था अद्भभुत । उन्हें ये मलाल नही थी कि हमलोगों ने पूर्ण सूर्यग्रहण को नही देखा बल्कि ३ मिनट ३८ सेकेंड का वो लम्हा अद्भुत था जब लोगों ने दिन मे ही तारों का दीदार किया । खैर तारेगना जो एक छोटा सा गांव था आज खबरों में नही है लेकिन इस विशेष खौगोलिय घटना का केंद्र बनने के बाद आर्यभट्ट की इस नगरी को विश्व मे एक अलग पहचान जरुर बन गइ है । लगभग तीन लाख लोग इस छोटे से शहर में अपनी उत्सुकता के पंख को लगाये शाम से ही एक स्थान पर जमा होकर सूर्यग्रहन का इंतजार करते देखना अपने आप में एक विहंगम दृश्य को निहारने के जैसा था । स्टेशन का नाम तारेगना है क्यूंकि तारेगना गांव के जमींदारों ने अंग्रेजों को स्टेशन के निर्माण के लिये जमीन इसी शर्त पर दिया था कि इसका नामकरण मेरे गांव पर होना चाहिये ..शहर का नाम मसौढी है ..जब तारेगना का नाम विश्व फलक पर अपनी चमक बिखेर रहा है तो अब मसौढी के लोग भी पूरे शहर का नाम तारेगना मे तब्दिल करने पर राजी हो गये है । मसौढी का नाम आते ही इसमें नक्सलवाद की बू आती है क्यूंकि बिहार में नक्सलवाद की जन्मस्थली मसौढी ही रही है ऐसे में मसौढीवासियों के लिये तारेगना का खगोलविग्यान का केंद्र में होना खूब भा रहा है ।

Tuesday, July 7, 2009

कुत्ता साधु को देखकर क्यूं भौंकता है ?


बिहार के छपरा , सिवान और पूर्वांचल के इलाके में शादियों में होने वाले नाच का कोइ तोड नही था । गाने बजाने के साथ लौंडा का नाच बहुत प्रसिद्ध था । उसमें कलाकारों के द्वारा नाटक का मंचन किया जाता था जो सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत होते थे । यूं कहे तो भिखारी ठाकुर के द्वारा जो नींव डाली गयी थी उन्हीं परंपराओं का निर्वहन उस स्थान के कलाकार करते रहे । हालांकि आज उस नाटक शैली की जगह फूहड औरकेष्ट्रा ने ले ली है । बचपन में उसी नाच का एक छोटा सा नाटक हमने देखा था जो आज तक याद है । नाटक था तीन सवाल ? पहला ..कुत्ता साधु को देखकर क्यूं भौंकता है ? कुत्ता सडक के बीचो-बीच क्यूं बैठता है ? कुत्ता उंची जगह को देखकर ही लघुशंका क्यूं करता है । कुत्ता साधु को देखते ही भौंकने लगता है कि महाराज आपकी जगह यहां नही है आप का तो काम तपस्या करना है ..इश्वर की सेवा करना है ..आप को तो जंगल में होना चाहिये फिर आप दुनियादारी की भीड में क्या कर रहे है।कुत्ता धरती को अपनी माता मानता है फिर भला उसी माता के शरीर पर पेशाब कैसे करें ।कुत्ता सडक के बीचों बीच इसिलिये बैठता है कि इसी मार्ग से संत , साधु , महात्मा के चरण धूल पडे है उन्ही को पूजता है ..कुत्ता चाहता है कि इस जन्म से मुक्ति पाकर इश्वर कहीं उन्हीं महात्माओं के चरणों की धूल में सेवा करने का अवसर दे दें।

Tuesday, May 26, 2009

रात को मैनें मुजरा देखा


बनारस की सुबह ..अवध की शाम के बारे में सुना था । हमारे एक दोस्त ने मुझे बताया कि भाइ उसके साथ अगर आपने सीताराम पुर का मुजरा नही देखा .तो शुरु के दोनों जुमले अधूरें है । हमारे वो अजीज मित्र एक बार मुझे ले गये सीतारामपुर । फिल्मों में मुजरें का सीन देखा करता था । नर्तकी का नाचना ..मसनद लगाकर जमींदार टाइप रइसों का महफील में बैठना ..जाम और पान के साथ वाह वाह कहना आदि दृश्य मेरे दिमाग में नाच रहे थे । जैसे ही शहर में हमने प्रवेश किया ..तबले की थाप और हारमोनियम की आवाज यह इशारा कर रहे थे कि आप निश्चिचित जगह पर पहुंच गये है । हमलोगों ने अंदर प्रवेश किया ...वो उस इलाके की प्रसीद्ध नृत्यांगना या आप जो कह लें ..समाज उसे यह शब्द नही देगा । मोहतरमा ने आदाब कहकर हमलोगों का स्वागत उसी अंदाज में किया जिस तरह की अदा ऐतेहासिक सिरियलों में बादशाहों के लिये कनीज किया करती है । तुरंत बंगाल पुलीस की गाडी वहां आ गइ । मोहतरमा ने १०० रु का कर अदा किया पुलीसवालें वहां से चले गये । बहुत छोटा कमरा था ...मेरे दिमाग में तो पाकिजा वाली हीरोइन मीना कुमारी वाला लंबा सा बरामदा ..पर्दा ..बगैरह बगैरह घूम रहा था । खैर ..तबला वाला बजैया आ गया जो उम्रदराज हो चुका था ..साथ में हारमोनियम मास्टर और बैंजो वाला । मोहतरमा ने डांस शुरु किया । डांस इसलिये कह रहा हूं क्यूंकि अब मुजरे में छाडे रहियें ..और इन्हीं लोगों ने की जगह ...जस्ट चियां चियां ..और ना ना ना नो इंट्री जैसे गानों ने ले रखी थी । डिस्कों और पता नही नये नये जमानें वाले फिल्मी गीतों पर डांस करते हुये प्रत्येक गानों पर २०० रु की छूट भी देनी पड रही थी ...मैने कहा कोइ पुराना फिल्मी गीत गाते तो बेहतर होता ...तबला मास्टर ने कहा कि हूजूर अब पुराने कद्रदान कहा रह गये ..महफिल तो बेनूर सी हो गइ है ..और ये ( यानि नर्तकी ) भी तो नये जमाने वाली है । १० गानें हुये थे और मेरे जेब से २००० रुपये जाया हो चुके थे । हने सोचा इसी महफिल और मुजरे में तो कइ राजवाडे और घराने लूटकर खाक हो गये चलो भागों यहां से और यह मुजरा मेरे जिंदगी का पहला और अंतीम हो गया ।

Sunday, April 26, 2009

केरल जहां चुनावी मुद्दे राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय है ।


२० लोकसभा सीटों वाले केरल में लोकसभा चुनाव एक चरण में ही खत्म हो गये है । मीडिया में राजनीतिक रसूख रखने वाले राज्यों की तो खूब चर्चा होती है लेकिन साउथ इंडिया के इस राज्य पर राष्ट्रीय मीडिया ने ज्यादा तवज्जों नही दी । भला हो शशी थुरुर की तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस की उम्मीदवारी का जिसकी बजह से यह राज्य राष्ट्रीय मीडिया में थोडा स्पेस पा सका। यहां कहा जाता है कि एक बार तू तो दूसरी बार मैं। पिछली बार सीपीएम की अगुवाइ वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने लगभग क्लीन स्वीप किया था ..२० में से १९ । एक सीट पर कांग्रेस की अगुवाइ वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के इंडियन मुस्लिम लीग के उम्मीदवार और वर्तमान में विदेश राज्य मेंत्री ई. अहमद मंजेरी सीट से जीत पाये थे । लगभग बीसों लोकसभा सीटों में कंपेनिंग एक तरह की । मुद्दों के क्या कहने ...अगर उत्तर भारत की बात करें तो राम और रोटी के साथ साथ नाली और गली भी लोकसभा चुनावों के मुद्दे होते है । यहां मुद्दे अलग किस्म के थे ..मसलन इजरायल सरकार के द्वारा गाजा पर हमले कर निर्दोष मुसलमानों का खून बहाया जा रहा है ..केंद्र सरकार का इस पर क्या स्टैंड है ....भरत अमरीकी परमाणु करार से भारत को क्या फायदे होने वाले है ....कांग्रेस को प्रो इजरायल बताने वाला लेफ्ट यह बताये कि बंगाल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री २० लोगों के बिजनेस डेलीगेशन को लेकर इजरायल में क्या करने गये थे । चुनाव की तिथी घोषित होने के महज २ दिन पहले भारत सरकार ने इजरायल के साथ बडा मिसाइल डील क्यूं किया ? हालांकि स्थानिय मुद्दों की बात करें तो उनमें दो बडे ही महत्वपूर्ण थे । पहला ऐसएनसी लेवनीन डील जिसमें कहा जाता है कि कनाडा की कंपनी से हुए इस डील में तत्कालिन उर्जा मंत्री और वर्तमान में स्टेट सीपीएम सेकेरेट्री पिन्नारी बिजयन की कथित भूमिका पर राज्य सरकार के द्वारा लीपापोती की कोशिश की गयी है । दूसरा सबसे अहम मुद्दा यूडीएफ का एलडीएफ पर था कि लेफ्ट ने चुनावी लाभ के लिये अपने सिद्दांतो की बली देकर पीडीपी यानि पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विवादस्पद नेता अब्दुल नसीर मदनी के साथ चुनावी तालमेल किया । ये वही मदनी है जिनपर १९९६ में हुए कोयंबतूर बम व्लास्ट का दोषी माना गया था और बाद में आठ साल की सजा भी हुइ थी । हालांकि बाद में कोर्ट इन्हें बेकसूर मानते हुए बरी कर दिया था । अगर पिछले विधानसभा चुनावों की बात करें तो कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार के मुख्यमंत्री ओमन चांडी के साथ मदनी के बडे बडे पोस्टर थे और जनता से यह कहा गया कि मदनी को झूठे आरोपों के तहत फंसाया गया है । हालांकि इस चुनाव में चांडी मतदाताओं से अपनी भूल के लिये माफी मांगते नजर आये । मदनी से जब हमारी बात हुइ तो मदनी ने कहा कि मुझे यूडीएफ के द्वारा फंसाया गया । मैं अगर अलगाववादी हूं तो यूडीएफ के परम सहयोगी इंडीयन मुस्लिम लीग क्या है ? कायदे आजम के द्वारा स्थापित इस पार्टी का झंडा आज भी पाकिस्तानी है । खैर पिनारी ने इस चुनाव में एक बहुत बडा जुआ खेला है ...लेफ्ट ने अपनी कूटनीति के तहत मुस्लिम लीग को घेरने के लिये पीडीपी को आगे किया है ..हालांकि इसका परिणाम यह हुआ है कि मल्लपुरम से मुस्लिम लीग के टिकट पर चुनाव लड रहे ई अहमद और पुनानी से किस्मत आजमा रहे इटी बशीर को पीडीपी की बजह से काफी पसीना बहाना पड रहा है । कहा जाता था कि बनातवाला हो या सुलेमान सेठ एक बार नामांकन करने आते थे और दूसरी बार जीत का प्रमाणपत्र लेने । आपको याद होगा कि पुनानी सीट को लेकर सीपीआइ ने पूरे राज्य में अकेले चुनाव लडने की घोषणा कर दी थी ..हालांकि बाद में समझौते के तहत सीपीएम ने सीपीआइ को वायनाड जैसी जोखिम भरी सीट दे दी वही पुनानी सीट पीडीपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार रंडथानी के लिये छोड दी । मल्लपुरम में हमने ई अहमद के बडे बडे कट-आउट देखें जिसमें अहमद यासर अराफत के साथ गले में गले डालकर शायद मतदाताओं को ये जता रहे थे कि फिलीस्तीन के सच्चे हितैषी वही है । उधर कांग्रेस के तिरुवनंतपुरम से उम्मीदवार शशी थुरुर को विरोधियों ने घेर रखा था उनपर आरोप लगाया जा रहा था कि उन्होने अपने एक लेख में इजरायल सरकार की वंदना की थी । थुरुर का कहना था कि मैनें हजारों लेख लिखें अगर उसमें से पांच लाइन इजरायल सरकार की किसी खूबी के बारे में रेखांकित किया तो विरोधी लोग उसी को लेकर मेरे पिछे पड गये है । वहां के लोगों की मानें तो उनका कहना था कि यहां के मतदाता विधानसभा चुनावों में सीपीएम के साथ तो हो जाते थे लेकिन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को सपोर्ट करते थे...बजह थी कि केंद्र की राजनीति में सीपीएम की किसी भूमिका का ना होना । हालांकि सन १९९६ के लोकसभा चुनावों के बाद जिस तरह से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने में लेफ्ट ने हरकिशन सिंह सुरजीत की अगुवाइ में किंग मेकर की भूमिका निभाइ तब से केरल के मतदाताओं को लगा कि लेफ्ट भी केंद्र की राजनीति में भूमिका निभा सकती है । उसके बाद से लोकसभा के चुनावों में लेफ्ट का प्रदर्शन निरंतर बेहतर होता गया । शायद यही कारण है कि वर्तमान तीसरे मोर्चे के घटक दल भले ही केंद्र में अपनी भूमिका को लेकर ओपेन है लेकिन लेफ्ट नन कांग्रेस और नन बीजेपी की सरकार बनाने के लिये ज्यादा मुखर है ।

Monday, April 13, 2009

वशिष्ठ बाबू दिल्ली के एक अस्पताल में एडमीट

वशिष्ठ बाबू को इंस्टीच्यूट आफ ह्यूमन विहैवियर एंड एलायड साइंसेज दिलशाद गार्डेन में चेकअप के लिये लाया गया है । यहां वो पहले भी दिखा चुके है । जिन सज्जन को गणीत के इस महानायक से भेंट करनी हो ..मदद करनी हो वो यहां पहुंचकर उनकी स्थितियों से खुद रुबरु हो सकते है । उनके जीवन के असाधरण पहलूओं को लोगों तक पहुंचाने के लिये अभी मैं प्रयासरत हूं।