Monday, February 19, 2018
LEFT VS RIGHT IN TRIPUPURA
Thursday, June 9, 2016
left-right
कांग्रेस के लाख दुर्दीन आ जायें। हेराफेरी और सीना जोरी से कांग्रेसी बाज नही आते । बात हम बंगाल चुनाव की कर रहे है । बंगाल में ममता बनर्जी की जोरदार वापसी हुइ। कांग्रेसी अपनी साख बचा पाये लेकिन लेफ्ट की लुटिया डूब गइ। बंगाल चुनाव कवर कर रहा था । गांवों में शहरों में जब घूमता था तो लोग कहते थे की ममता की सरकार बनेगी लेकिन उनकी सीटें घटेंगी । दस में से नौ लोगों का यही कहना था । एक चीज जो उलट लग रही थी कि कभी बंगाल के गांवों में लेफ्ट का दबदबा होता था लेकिन जब गांवों में हम घूम रहे थे तो मामला उल्टा चल रहा था । एक बडी बात जो हमने देखी खासकर जब कांग्रेसियों से पूछता था कि आपकी पार्टी का क्या हाल है तो कांग्रेसियों का जबाब था कि ८० प्लस लायेंगे । जब हम पूछते थे कि जहां जहां लेफ्ट लड रहा है वहां क्या कांग्रेसी भी मन के साथ उन्हें वोट कर रहे है ..उनका जबाब था कि वो सब तो ठिक है लेकिन जैसे ही इवीएम मशीन पर हसिया हथौडा देखते है तो लेफ्ट का वो वर्बर ३४ साल याद आ जाता है । आपको याद होगा कि लोकसभा चुनावों के पहले ममता ने कहा था कि जरुरत पडी तो टीएमसी और लेफ्ट साथ आ सकते है । यह ममता के आत्मविश्वास के डिगने का घोतक था । लेफ्ट के आत्मविश्वास को देखिये कि जिस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के बारे में कहा करती थी कि कांग्रेस और भाजपा में कोइ फर्क नही है उसी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से बाज नही आइ। टीएसी भी यही चाहती थी कि विपक्ष में कांग्रेस आये और लेफ्ट को धाराशायी कर दो ऐसी कमर टूटे कि आने वाले दिनों में खडी ही नही हो पाये ।
Thursday, June 27, 2013
लालू-नीतिश-पासवान पुराण ( भाग-१)
शाहनवाज हुसैन ने पटना में एक रैली को संबोधित करते हुये कहा कि नीतिश सत्ता से बाहर रह ही नही सकते । वो हवाला १९९५ का दे रहे थे जब समता पार्टी बिहार में लालू के मुकाबले बुरी तरीके से पीट गइ थी । चुनाव परिणामों के बाद नीतिश ने कहा था कि अब वो राजनीति छोडकर किताब लिखेंगे । फिर कुछ दिनों के बाद ये खबर आइ कि नीतिश बिहार में रहकर ही लालू सरकार के खिलाफ सडक पर संघर्ष करेंगे । बात आइ गइ हुइ बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन हुआ और केंद्र में एनडीए की सरकार बनी । नीतिश कुमार को चूंकि अटल बिहारी बाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था । उन्हें रेल मंत्री के पद से नवाजा गया । बिहार में रहकर संघर्ष करने की बात हवा में रह गइ। नीतिश और लालू के बीच आपसी बैमनस्य इतना था कि रेल डिब्बों मे दूधिया लोग जो लालू की जाति के है नीतिश के आदेश पर उन्हें आरपीएसएफ के द्वारा डंडो से पिटाइ की जाती थी । जातियता की अगर बात करें तो रेल के विभिन्न मलाइदार पदों पर नीतिश ने अपनी जाति के लोगों को चुन चुन कर बिठाया । हां नीतिश को इतना आभास था कि लालू को भविष्य में पछाडा जा सकता है । चूंकि लालू कहा करते थे कि वोट का पैमाना विकास नही है जातिगत समीकरण ही वोट का पैमाना है । इस नब्ज को पकडकर नीतिश ने बिहार में रेल के विकास पर बहुत काम किया । पहली बार जब लालू पशुपालन घोटाले में जेल गये तो बेउर जेल उनके समर्थ उन्हें दूल्हे की तरह बिठाकर जेल के दरवाजे पे ले गये । समर्थक नारे लगा रहे थे कि जेल का फाटक टूटेगा ..लालू यादव छूटेगा । राजनीति में परिवारवाद का मुखाफलत करने वाले लालू को अपनी पार्टी के किसी नेता पर विश्वास नही रहा। जब बातें हवा में चल रही थी कि लालू के जेल जाने के बाद सीएम का पद कौन संभालेगा ..इसपर टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर छपी कि रंजन प्रसाद यादव..जयप्रकाश नारायण यादव या आर के राणा में से किसी को लालू गद्दीशीन करेंगे । अगले दिन जनसत्ता में ये खबर छपी कि अंदरखाने में लालू ने बिहार की कमान अपनी पत्नी को सौंप दी है । इस खबर पर राजद और अन्य दलों के नेता खूब हंसे। अगले दिन विधायक दल की बैठक हुइ..किसी को इसका आभास नही था कि राबडी देवी को नेता चुन लिया जाएगा । हालांकि सब प्री प्लान था ..लालू के सबसे विश्वस्त श्याम रजक ने राबडी के नाम का प्रस्ताव किया ..भला किसमें दम था इसका विरोध करने का । राबडी मुख्यमंत्री बनी और लालू जेलयात्रा पर निकल गये । अब राबडी जो साहब के लिये खैनी मांग कर लाती थी सीएम क्वार्टर के आस पास के लोगों से सीधा बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गइ। अनपढ और सियासत की गलियों से अनजान राबडी के लिये ये एक डरावना मंजर था । साथ ही पार्टी के अंदर ही सीएम पद का ख्वाब देख रहे तमाम नेताओं के विद्रोह का डर । तब राबडी ने अपने दोनों प्यारे सालों के हाथ में बिहार की कमान अघोषित रुप से सौंप दी । एक राजनीतिक अपराधी था तो एक शुद्द गंवार अपराधी । साधु तो राजनीति सीख गये थे लेकिन सुभाष जिसे लगता था कि कमाने का तरीका ..रंगदारी ,,अपहरण और ट्रांसफर ..पोस्टिंग से ही हो सकता है । इतना इन दो सालों ने गदर मचाया कि बिहार की जनता की नजरों मे लालू जो हीरो हुा करते थे ..जीरो की तरफ बढने लगे । मुझे याद है कि सुभाष यादव का कार्यक्रम अगर बिहार के किसी कोने में आपको लेना है तो सुभाष की ये शर्त होती थी कि आने के बाद उन्हें सिक्कों से तौला जाये । ८५ किलों का सुभाष यादव को अगर सिक्कों से तौला गया तो आप उसका दाम निकाल लिजीये । हां एक बात होती थी कि जिस किसी छुटभइये ने युवा हर्दय सम्राट सुभाष यादव का कार्यक्रम ले लिया वह उस एरिया या जिले का डान हो गया । अब वो सारी वसूली अफसर से लेकर दूकानदारों तक की इकढ्ठा करता था और उसमें से अपना शेयर काटकर सुभाष बाबू को पहुंचाया करता था । जनता की नजरों में राजद की सरकार दिन ब दिन गिरती जा रही थी । इधर नीतिश एनडीए में रहकर बतौर रेलमंत्री जो काम कर रहे थे वो लोगों को दिखने लगा । बिहार की जनता को विकास का पहला टेस्ट नीतिश ने रेल में काम करके चखाया । इसके बाबजूद लालू इतने कमजोर नही हुये थे । फरवरी २००५ मे विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश मिला ..नीतिश सरकार बनाने की जुगत लगा रहे थे ..अगर वो जोड तोडकर सरकार उस समय बना लेते तो उनका भी हश्र मदु कोडा सरखा होता । लालू को ये कतइ बर्दाश्त नही था क्यूंकि लालू को उस समय भी यह लग रहा था कि बिहार उनके परिवार की जागिर है । केंद्र में यूपीए के साथ सांठ-गांठ करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगवा दी । राष्ट्रपति शासन के दौरान बूटा सिंह और उनके दो पुत्रों बंटी और लवली ने मिलकर वही काम किया जो साधु और सुभाष राबडी के लिये किया करते थे ..और यही कारण रहा कि अक्तूबर के चुनाव में जनता ने नीतिश के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की मुहर लगाकर लालू और पासवान को बाहर का रास्ता दिखा दिया ।
Saturday, February 16, 2013
लेफ्ट का आखिरी किला या सरवाइवर ?
त्रिपुरा में विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों का भाग्य इवीएम मशीन में स्टोर्ड हो चुका है । बंगाल और केरल जैसे लेफ्ट रुल्ड स्टेट को कवर करने के बाद त्रिपुरा के राजनीतिक तापमान और मुद्दों को नजदीक से देखने का मौका मिला । शायद उत्तर पूर्व के राज्यों में इतना सभ्य , सुसंस्कृत और सुंदरता को समेटे शायद ही कोइ दूसरा राज्य हो। ६० विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में वामफ्रंट ( सीपीएम, सीपीआइ, आरएसपी, फारवर्ड ब्लाक ) और कांग्रेसनीत गठबंधन (कांग्रेस, एनपीटी, एनसीटी ) के बीच कडा मुकाबला है । मुद्दों की अगर बात की जाये तो लेफ्ट फ्रंट का दावा है कि उसने राज्य में अशांति और गुंडागर्दी को खत्म कर इस राज्य को ना सिर्फ शांति और अमन की पटरी पर लाया बल्कि विकास का लाभ समाज के निचले पायदान पर खडे लोगों तक पहुंचाया । पिछली बार ६० में से ४९ सीटें जीतनेवाली लेफ्ट फ्रंट का आदिवासी समाज के बीच भी गहरी पकड है । इसका सबूत है कि पिछले चुनाव में एसटी के लिये सुरक्षित २० सीटों में से १९ पर वाम फ्रंट ने अपना कब्जा जमाया था । इसके अलावा केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं को लागू करने में यह राज्य ना सिर्फ नार्थ-इस्ट राज्यों में नंबर वन है बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर भी ये राज्य टाप टेन पर है । हालांकि विपक्ष का मानना है परिवर्तन की हवा का असर बंगाल के बाद यहां भी महसूस किया जा रहा है । कांग्रेस का कहना है कि राज्य में सिर्फ उसी का विकास हुआ जो सीपीएम के कैडर हैं । आम आदमी वहीं रहा जहां पिछले २० सालों से था । लेफ्ट की ओर से उनके केंद्रीय नेताओं ने राज्य में अपनी पार्टी के पक्ष में जोरदार प्रचार किया । वृंदा करात , सीताराम येचुरी मोहम्मद सलीम सहित मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपनी पार्टा के लिये खूब पसीना बहाया । वहीं कांग्रेस की ओर से केंद्रीय मंत्री दीपा दास मुंशी वित्त मंत्री चिदांबरम सहित कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी ओर से खूब जोर लगाया । हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का प्रस्तावित दौरा रद्द होने के बाद राज्य कांग्रेस को फजीहत का सामना करना पडा । लेकिन बाद में राहुल गांधी ने ताबडतोड छः जनसभायें करके कांग्रेस के खेमें में उत्साह का संचार कर दिया । राजनीतिक पंडितों का कहना था कि अगर राहुल गांधी नही आते तो कांग्रेस का कबाडा निकल जाता । कांग्रेस के लिये सबसे परेशानी का सबब ये है कि १९८९ में उनकी सरकार यहां रही और राज्य में गुंडागर्दी और आतंक का बोलबाला रहा। इस दाग से कांग्रेसी अभी भी उबर नही पाये है और राज्य कांग्रेस ने सभाओं में कहा है कि अगर इस बार उनकी सरकार बनी तो उस गलती को दोहराया नही जाएगा । इसके अलावा लेफ्ट फ्रंट का एक और संगीन आरोप है कि कांग्रेस का गठबंधन उसी आएनपीटी से है जिसके सर्वेसर्वा बिजय रांकल कभी टीएनबी छापामार दस्ते के हेड हुआ करते थे । वहीं टीएनबी जिसने ८० और ९० के दशक में बंगाली समुदाय और आदिवासी समुदायों के बीच खून की होली खेली थी । हालांकि कांग्रेस का कहना है कि रांकल अब राजनीतिक पार्टी के हेड है और वर्तमान में विधायक भी है ।
राजनीतिक तापमान और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है इसका फैसला आगामी २८ तारिख को हो जाएगा लेकिन एक बात तय है कि पिछले १९ बरसों से लगातार सत्ता पर काबिज लेफ्ट को गद्दी से उखाडना कांग्रेस के लिये उतना आसान नही होगा । वैसे आम हिंदुस्तान से कटे इस राज्य में आपको भी आना चाहिये । शांति और भयमुक्त वातावरण के साथ अनेकों ऐसे पर्यटक स्थल है जहां आप अपने आपको प्रकृति से काफी करीब पायेंगे ।
Saturday, June 2, 2012
ब्रह्श्वेर मुखिया की मौत के बाद
मैं उस समय जहानाबाद में बेहद सक्रिय था । खेल संघो का अद्यक्ष और महासचिव होने के अलावा सांस्कृतिक क्रिया कलापों से भी जुडा था । बात १९९५ की होगी सवेरे मुझे पता चला कि बाथे में रणवीर सेना के द्वारा ५० से उपर लोगों का नरसंहार कर दिया गया है । इसके बाद शुरु हुा नरसंहारों का अनंत सिलसिला ..शंकर बिगहा ..नारायणपुर ...रामपुर चौरम ..कहीं छिटपुट तो कहीं दिल दहला देने वाला । रातों रात रणवीर सेना उच्च वर्ग के किसानों के लिये राबिनहुड बनकर उभरा । प्रतिशोध में पिपुल्स वार ग्रुप और एमसीसी जो आपस में लडते लडते थक चुके थे ..रमवीर सेना से मुकाबला करने के लिये दोनों एक मंच पर ए गये । जहाना बाद के तत्कालिन डीएम प्रत्य अमृत बडी शिद्दत से इन घटनाओं का मुकाबला हर एक फ्रंट से करने की कोशिश कर रहे थे । हालांकि वो क्रिकेट के शौकिन थे ..नारायणपुर नरसंहार के समय सवेरे वो क्रिकेट प्रैक्टिस कर रहे थे ..इधर पत्रकारों ने खबर निकाल दी ..कि रोम जल रहा है और नीरो वंशी बजा रहा है । उनका तबादला कर दिया गया । उनके जगह पर डीएम अरुणीश चावला आये ( वर्तमान में मोंटेक सिंह अहलूवालिया के पीएस ) । जहाना बाद और अरवल के गांवों में जातिय वैमनष्य की धधकती चिंगारी के बीच इस शक्श ने शानदार मिसाल कायम की । रात रात भर ये उग्रवाद प्रभावित गांवों में लोगों के साथ सोते थे और उन्हें समझाते थे कि हिंसा का रास्ता छोडकर आप लोग मुख्यधारा में लौटो । वैसे युवा जो राह भटक कर हिंसा के आगोश में जाकर बंदूक थाम लिये थे उन्हें सरकारी ऋण की व्यवस्था करायी और उद्योग धंधा लगाने के लिये प्रेरित किया । पूरे ग्रामीण समूह को हिंसा और अराजकता के खिलाफ चावला लोगों को सडकों पर उतारने में सफल हुये । १९९९ मार्च में रमवीर सेना के द्वारा ३४ उची जाति के भूमिहारों को बडी ही बेरहमी से मार डाला गया । कहा जाता है कि एक टीचर जो उस गांव में २ साल पहले आये था और बच्चों को फ्री में शिक्षा देने के नाम पर उसने नक्सलियों के ऐजेंट के रुप में गांव में काम किया । एक एक घर का हिसाब किताब उसने दो सालों में ले लिया । कहा जाता है कि नरसंहार के घटित होने के बाद फिर दुबारा उसे गांव में नही देखा गया । प्रतिशोध में रणवीर सेना ने जहाना बाद औरंगाबाद सीमा से सटे गांव मियांचक में नरसंहार को अंजाम दिया जिसमें दुधमुंहे बच्चे और गर्भवती महिलाओं तक को नही बक्शा गया ।अगर रणवीर सेना के नेताओं का भाजपा और जदयू से संबंध था तो उस समय राजद के साथ एमसीसी खडी थी । ११९९ के लोकसभा चुनाव में राजद के अपराधिक छविवाले उम्मीदवार और लालू प्रसाद के करीबी सुरेंद्र यादव की हार जद यू के अरुण कुमार के हाथों हो गइ। अरुनीश चावला का सिर्फ इतना दोष था कि उन्होने सुरेंद्र यादव की गुंडा गर्दी नही चलने दी । हार से खिझकर लालू ने अरुनीश चावला का जहानाबाद से तुरंत तबादला करा दिया । जहानाबाद और अरवल के आसपास जितने नरसंहार हुये दोनो पक्ष रमवीर सेना या नक्सलियों ने उन्हीं गांवों को टारगेट किया जो शांतिप्रिय और भोले भाले थे । अगर रणवीर सेना कोि घटना को अंजाम देती थी तो पुलीस को वैसे नाम एफआइआर में दर्ज कराये जाते थे जो भूमिहार तो थे लेकिन पढते थे इंजीनियरिग और मेडिकल कालेजों में ..या वैसे युवा जिन्हें इस नरसंहार की राजनीति डसे कोइ लेना देना नही था । दोनों तरफ से बरबादियों की अंतहीन कहानी है ।आज इन क्षेत्रों में शांति और अमन बहाल होने की तरफ बढ रही थी तो ब्रह्श्वेर मुखिया की हत्या मे नये सिरे से
पुराने घावों को हरा करने की कोशिशें जो की जा रही है वो रास्ता बरबादियों का होगा ना कि आबाद होने का ।
Sunday, November 7, 2010
ऐतेहासिक होगा बिहार के लोगों का फैसला

Saturday, August 14, 2010
पिपली लाइव का असली हीरो नत्था नही राकेश है ?

Tuesday, May 11, 2010
क्यूंकि मैं दूरदर्शन में हूं ।
हमारा दोस्त आशुतोष पाण्डेय है । दून में पढा है ..स्मार्ट भी है सिर्फ दिखने में ही नही बल्कि अपनी काबलियत से भी । कुछ दिन पहले वो एक साक्षात्कार में गया ..अंग्रेजी के लब्धप्रतिष्ठित चैनल में ..इंटरव्यू में उसके सामने थे उस चैनल के प्राइम टाइम एंकर या समझलिजीये बौस । सारे प्रश्नों का बेबाक उत्तर देने के बाबजूद उसे बताया गया कि आप दूरदर्शन में है इसलिये खबरें निकाल पाना आपके बस में नही है । आशुतोष ने मुझे बताया कि क्या खबरें निकालना सिर्फ निजी चैनलों के ही बस का है ? खबरें हम दिखाते है और हमारे चैनल के लोग मेहनत भी करते है हम खबरों में मसाले का छौंक नही दे पाते है ..उसे सनसनिखेज नही बना पा पाते है ..हम टी आरपी के खेल से भी अलग है ...हम थोडा पिछे रह जाते है लेकिन खबर पक्की जब तक नही हो जाये नही दिखा पाते है । खबरों के छौंक का एक छोटा उदाहरण हम आपसे शेयर करना चाहते है । भारत अमरीका परमाणु करार के मामले में राजनीतिक सरगर्मीयां अपने चरम पर थी । वाम पार्टियों का एक छोटा सा मूवमेंट भी खबर का एक अहम हिस्सा बन चुका था । एक शाम खबर आयी कि प्रकाश करात १० जनपथ में कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने आ रहे है । १० जनपथ में उस समय संतन की भीड जुट गयी थी पूरे लाव लश्कर के साथ । तमाम तरह के लाइव इनपुट चैनल के महान रिपोर्टर अपने संस्थान के लिये कर रहे थे । ६ बजे का समय शायद निर्धारित था सीपीएम महासचिव का कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने का । ९ बज गये थे ..लेकिन प्रकाश करात का कोइ अता पता नही था । प्राइम टाइम में एक लाइव इनपुट बडे चैनल के बडे रिपोर्टर ने शुरु किया । एंकर ने पूछा लेटेस्ट अपडेट बताइये । रिपोर्टर ने अपने स्पीच में जोरे बाजू का इस्तेमाल करते हुये ब्रेकिंग खबर दिया कि प्रकाश करात आये तो थे कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने लेकिन वो पिछले दरवाजे से आये और मैडम सोनिया गांधी से मिलकर चले गये । रात के ११ बज गये थे सारे चैनलों ने वाइंड अप कर लिया । हम भी वाइंड अप हो गये । उस दिन मुझे पता चला दूरदर्शन और निजी चैनल का फर्क । मैने सोचा कि इस रिपोर्टर को शायद प्रकाश करात ने ही बताया होगा कि भइया हम पिछले दरवाजे से मिलकर चले गये । खबरों की खबर रखने वाले से हमारा क्या मुकाबला । बात आयी गयी हो गइ .. एक दिन के बाद प्रकाश करात की गोपालन भवन में पीसी थी । सारे अखबारनवीस और चैनल के बडे बडे रिपोर्टर पहुंचे थे । पीसी के बाद सवाल जबाब का सिलसिला शुरु हुआ। सब लोग थक गये अपने अपने सवाल पूछ कर ..मसलन आप लोग भौंकते है काटते नही ...बगैरह वगैरह । मुझे तो पिछला दरवाजा वाला सवाल दिमाग में घूम रहा था । मैने पूछ दिया कि कल आप १० जनपथ में पिछले दरवाजे से कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने गये कृप्या आप बतायें एटमी करार पर क्या बात हुइ । प्रकाश करात ने कहा कि मैं कल दिल्ली में था ही नही । मैने अपना माथा पीट लिये । तब मुझे अहसास हुआ कि आखिर खबरों के निकालने की तरकीब क्या होती है । हाल ही में एक दिन गोपालन भवन में हरिकिशन सिंह सुरजीत पर एक बुकलेट का विमोचन था प्रकाश करात , सीताराम तथा कामरेड सुरजीत की पत्नी भी उपस्थित थी । इसी बीच हमारे दूरदर्शन के एक पत्रकार दोस्त ने फोन किया कि आलोक जी कानू सन्याल ने आत्म हत्या कर ली है हो सके तो इसपर एक बाइट ले लिजीये । निजी चैनल के एक बडे रिपोर्टर से हमने वह बात उन्हे कही कि प्लीज ये सवाल पूछिये ...उन्होने कहा कि हु इज कानू सान्याल ? दोस्तों तों वो बीट रिपोर्टर थे उसमें भी बडे चैनल के । यहां आप कतइ ये नही समझेंगे कि मैं अपनी शेखी बघार रहा हूं ... अरे हम तो रिपोर्टर कहलाने के तो काबिल ही नही है ...इसलिये कि दूरदर्शन में है ।Tuesday, March 23, 2010
भूत पड गया लालाजी के चक्कर में - एक लोककथा

Friday, March 19, 2010
नजर सुरक्षा चक्र -- इलाज से बढिया ऐहतियात बरतें

नाम- मिसेज देसाइ ...राजस्थान की रहने वाली ..इनके पति बहुत बडे व्यवसायी है । दस साल पहले इनकी बर्तन की एक छोटी सी दूकान थी । अपनी मेहनत और कर्म के बलबूते आज इनकी बर्तन की तीन तीन बडी फैक्टरियाँ है । सब कुछ ठिक ठाक चल रहा था । एक दिन इनकी चाची सास इनके घर आ गयी ..बस बोलना शुर किया ..बाप रे बाप कितनी तरक्की तूने कर ली है ..ऐसा व्यापार ..इतने पैसे ..तेरी पत्नी के इतने गहने ..और एक मेरे पति जो सिर्फ गवांना जानते है बनाना नही । तभी चाची की दोनो आंखों से चिंगारी निकली ( ठिक वैसा ही जिस तरह रामायण सीरियल में राम के वाण चलने के बाद रावण तक पहुंचते पहुंचते ( रे यानि किरण का रुप लेकर पहुंचती थी ) और उसके बाद मिस्टर देसाइ की आँखो मे जाकर चुभ गयी । एक स्पेशल इफैक्ट होता है और मिस्टर देसाइ के शरीर का अग्र भाग बिल्कुल लाल हो जाता है । बस क्या था ..उसी दिन से मिस्टर देसाइ उखडे उखडे रहने लगे । धीरे धीरे उनका व्यापार भी उजडने लगा । पूरा परिवार परेशान हो उठा । भला हो मिसेज देसाइ का जिन्होने बिना अपनी पति के अनुमती के बगैर इस नंबर पर संपर्क किया ( ९३१२९२२६२२६) फिर एसएमेस किया ( एनएसके ५६७६७) और उसके बाद उन्हें मात्र २३७५ रुपये में मिला नजर सुरक्षा चक्र । दिव्य ऋषी संस्थान के वैग्यानिकों के द्वारा बनाया गयी एक ऐसी माला जिसके पहनने के बाद आपके इर्द गिर्द वह माला पोजीटिव एनर्जी क्रियेट करता है और आप पर डाले गये निगेटीव एनर्जी की काट करता है । माला के पहनते ही मिस्टर देसाइ का जीवन ही बदल गया और उनका व्यापार भी अपने पुराने ढर्रे पर आ गया । चाची सास आज भी उनके पास आती है और निगेटीव एनर्जी क्रियेट करती है लेकिन वाह रे नजर सुरक्षा चक्र का कमाल ..समझिये नजर लगानेवाली की ऐसी तैसी । पुणे की रहनेवाली पेशे से शिक्षिका बरखा गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ उनकी भाभी ने बरखा की शादी काट दी । नजर सुरक्षा का लाकेट पहनते ही उनकी भी दुनिया बदल गयी । महामंत्रों के जाप इस लाकेट में इनबिल्ट है । नजर सुरक्षा ही है आपके भाग्य की चाबी ..और हां ३० दिनों के अंदर इस लाकेट ने अपना काम नही किया तो कंपनी आपसे ली हुइ सहयोग राशी भी वापस कर देगी । जल्दी किजीये क्या पता कोइ बुरी नजर आपका पिछा कर रही है । बचपन में हमारी मां नवरात्री के दिनों में हमारी नाभी पर काजल का टीका लगाती थी ...बुरी नजरों से बचाने के लिये ..गाय भैंस से दूध का व्यापार करने वाले अपने गौशाले में बंदर रखा करते है बुरी नजर से बचाने के लिये । २० साल पहले बिहार में एक अफवाह उडी कि भइया अपने घर पर पंजा छाप के लेबल की छपाइ करों नहीं तो घर की ऐसी तैसी हो जायेगी । सारे घरों पर पंजे का लेबल छप गया बुरी नजरों से बचने के लिये । कुछ वर्षों पहले अचानक गणेश जी दूध पीने लगे । हालांकि उन्हीं दिनों एक डेमों में एक प्रसीद्ध वकील ने गणेश जी को शराब भी पिला डाली । दूकानदार जब शाम को अपनी दूकान बंद करते है तो बंद शब्द का प्रयोग नही करके बढाना शब्द का उपयोग करते है । रवि शास्त्री ने अपना एकमात्र दोहरा शतक आष्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में लगाया । उस मैच में जो जुराब उन्होने पहनी थी उसे लगाचार फटे चिथडे हालात में भी दस साल टोटके के तौर पर पहनते रहे ।तेंदुलकर अच्छी पारी खेलने के बाद और कपिलदेव क्रिज पर पहुंचने के पहले सूर्य भगवान को अभिनंदन करना नही भूलते । ऐसे में मेरी सलाह है आप सब टोटके को छोडकर नजर सुरक्षा चक्र को अपनाये कोइ विघ्न आपके पास नही फटकेगा ।
Thursday, December 10, 2009
एक नक्सली की कहानी- पार्ट-२

अब बिलाइ मियां अपने बौद्धिक अंदाज में अपना दर्शन मेरे सामने बयां कर रहे थे । मैने कहा बिलाइ मियां जब तक वैचारिक क्रांति आप लोगों के अंदर समावेश नही करेगी तब तक आप अपने मकसद में कैसे सफल होंगे । बिलाइ ने माओ-त्से-तुंग का डायलाग बोला क्रांति बंदूक के नली से होकर गुजरती है । खैर दस्ता प्रमुख ने बोला आलोक जी अब हमारा पडाव यहां से चल रहा है ..हमने पूछा कि कहां ..बोले मुझे भी नही मालूम । अब बिलाइ मियां बहुत मशहूर हो चुके थे । उनके नाम से ही बडे बडे अपराधी थर्राने लगे थे । खैर बिलाइ इमानदार थे और शोषितों के लिये उन्होने हमेशा संघर्ष किया । एक दिन अपने बाल बच्चों से मिलने अपने पैतृक घर पहुंचे पुलीस के भदिये ने इसकी खबर प्रशासन को दे दी । बिलाइ मियां अरेस्ट हो गये इनके साथ एक और नामी नक्सली पकडा गया । पुलीस की नजर में ये नक्सली कुख्यात होते है क्यूंकि बारुदी सुरंग बिछाकर नक्सली संगठन कितने ही पुलीसकर्मिंयों को मौत की निंद सुला चुके है । इन दोनो नक्सली नेताओं के साथ पुलीस ने बेइंतहा जुल्म किये । बिलाइ के साथी को पुलीस ने इतना प्रताडित किया कि उसकी मौत पुलीस हिरासत में हो गइ । मीडिया ने बहुत हो हल्ला किया ..मानवाधिकार संगठन भी काफी चिल्लाये लेकिन जहां तक मुझे जानकारी है न्याय अभी भी कोसों दूर है । बिलाइ की भी बहुत पिटाइ हुइ । कइ मुकदमों मे संलग्न है इस बीच उनका पूरा परिवार दाने दाने को मुहताज हो गया ..और उस भू माफिया ने ... कहा जाता है कि नक्सली संगठन को मोटी रकम देकर मामले को रफा दफा करा लिया । जिस जमीन के हक को लेकर बिलाइ ने बंदूक उठायी थी ..उसके जमीन पर उसी भू माफिया का आज एक सुंदर सा मार्केटिंग काम्पलेक्स बिलाइ मियां की जमीन पर चमचमा रहा है ।
( समाप्त)
Tuesday, December 1, 2009
एक नक्सली की कहानी
( शेष जारी है । )
Tuesday, August 25, 2009
आनंद जैसी फिल्में बार बार नही बनती । पार्ट-१

गीतकार गुलजार की ७३ वीं वर्षगाठ पर विभिन्न चैनल अलग स्टोरी चला रहे थे । एक चैनल में आनंद का वो गीत जिंदगी कैसी है पहेली ...चल रहा था ..पैकेज में बताया जा रहा था गुलजार का ये अमर गीत आज भी दिल की गहराइयों को छू जाता है । हकीकत है कि इस गाने के गीतकार योगेश है ..इसी फिल्म का एक और गीत कहीं दूर जब दिन ढल जाये..के लेखक भी योगेश ही है । मैने तेरे लिये ...ना जिया जाय ना ..और मौत ती एक पहेली है के गीतकार गुलजार है । हालांकि इन सभी गीतों का संगीत अमर संगीतकार सलील चौधरी ने दिया है । १९७२ में बनी इस फिल्म के सारे किरदारो को देखकर ऐसा लगता है कि वे सब हमारे और आपके बीच के हों । पहले इस फिल्म के लीड रोल के लिये महमूद और किशोर कुमार को ह्रषिकेश मुखर्जी ने चुना था । इस सिलसिले में जब ह्रषि दा किशोर कुमार के आवास पर पहुंचे तो दरवाजे पर खडे चौकीदार ने उन्हे वहां से भगा दिया । दरअसल किशोर कुमार का एक स्टेज कार्यक्रम किसी बंगाली सेठ ने करवाया था । जब पैसे की भुगतान की बात आयी तो बंगाली सेठ ने तयशुदा पैसे नही दिये । किशोर कुमार के बारे में ये सबको पता है कि वो अपने मेहनताने में से एक रुपया भी कम नही लेते थे ..यहां तक कि कटे फटे नोट भी वो स्वीकार नही करते थे । उस बंगाली सेठ से किशोर दा की मारपीट भी हो गयी थी थी । तब किशोर दा ने अपने दरबान को ये स्पस्ट आदेश दे रखा था कि किसी भी बंगाली को घर के अंदर नही घुसने देना । जैसे ही ह्रषि दा ने अपना नाम मुखर्जी बताया दरबान ने उन्हें खदेड दिया । ह्रषि दा इस घटना से इतना आहत हुये कि उन्होने निश्चय किया कि इस फिल्म में किशोर कुमार को तो कभी नही लेंगे। बाद में महमूद से भी बात नही बनीं और इस फिल्म में दो नये अदाकार अमिताभ और राजेश खन्ना को ह्रषि दा ने लिया ।बाबू मोशाय राजकपूर ऋषि दा को कहा करते थे उसी से प्रभावित होकर निर्देशक महोदय ने बाबू मोशाय का करैक्टर आनंद में रखा । बाबू मोशाय उस दौर में एक प्रतीक बन गया था राजेश खन्ना और अमिताभ के संदर्भ में ।
अगली बार आनंद से जुडी कुछ और बातें )
Tuesday, July 28, 2009
हमारे जनप्रतिनिधी

( ये दोनो प्रसंग सिनापा जी ने हमें भेजा है ॥आपके सामने रखने में मजा आयेगा । )
( एक)
बिहार में संविद की सरकार गिर गयी थी । शोषित दल की सरकार बनी थी । उस मंत्रीमंडल में एक मंत्री किसी मठ के महंत थे । महंथ जी के पास एक फाइल आयी । फाइल चूंकी महत्वपूर्ण थी इसलिये सचिव महोदय महंथ जी चैम्बर में स्वंय चले गये और महंथ जी से कहा कि महोदय एक बहुत ही महत्वपूर्ण फाइल हमने आपके यहां नोट देकर भेजा है । कृप्या इस फाइल पर पर कारवाइ करके वापस लौटाया जाय। सचिव के जाने के बाद मंत्री ने फाइल मंगवाया । उसको उलट पुलट कर देखा और रख दिया । थोडी देर के बाद एक सहायक आया और मंत्रीजी से बोला कि हुजूर फाइल सचिव महोदय साहब मंगवायें है । मंत्री जी ने फाइल को फिर उलट पुलट कर देखा और फिर वहीं रख दिया । फाइल चूंकि अर्जेन्ट थी इसलिये सचिव महोदय स्वंय महंथ जी के कमरे में आ गये और फाइल के लिये याचना की । महंथ जी विफरते हुये बोले ॥बार बार फाइल के लिये आदमी भेज रहे है ? फाइल उछालकर बोले ...कहां है नोट ? कांग्रेसियों को आप लोगों ने बहुत ठगा है ॥आप हमें ठगने चलें है । हम महंथ है ..ठगाने वाले नही है ...। कहां आपने फाइल में नोट दिया है और बार बार तगादा किये जा रहें है । पहले तो सचिव महोदय हक्का बक्का रह गये । तुरंत बात उनकी समझ में आ गयी । सचिव महोदय ने महंथ जी को समझाया कि फाइल पर लिखने को नोट देना कहा जा ता है । मंत्री जी सचिव महोदय का मुंह ताकते रह गये । उन्होने कहा महाराज ऐसा था तो पहले ही बता देते ना कि दस्तखत करना है । बार बार नोट नोट क्या चिल्ला रहे थे ।सचिव महोदय संचिका लेकर बाहर निकल गये और पहला काम किया कि जिस वाकये को प्रधान सचिव को सुनाया बाद में बात फैली तो अखबारों में भी छपी ।
(दो)
ललित नारायण मिश्रा समस्तीपुर बम - विस्फोट में घायल हो चुके थे । समस्तीपुर से दानापुर लाने के क्रम में उनकी मौत हो गयी । अब्दुल गफूर सरकार ने घोषणा की कि जो भी एल एन मिश्रा के मौत के रहस्य का अनावरम कर देगा उसे पच्चीस हजार रुपया नगद इनाम और पुलीस के आदमी को प्रमोशन दिया जाएगा । समस्तीपुर के तत्कालिन एसपी ने रहस्य का खुलासा कर दिया । घोषणा के अनुसार गफूर कैबिनेट ने उक्त एसपी को नगद इनाम सहित डीआजी बनाने की घोषणा कर दी । दूसरे ही दिन गफूर मियां को उनके पद से हटा दिया गया । जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री बन गये । उन्होने पहला काम किया । गफूर मियां के मंत्रीमंडल के निर्णय को तत्काल निरस्त कर दिया और मामले को सीबीआइ को सौंप दिया । मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद अब्दुल गफूर मुख्यमंत्री आवास से दो अटैची हाथ में लेकर सडक पर आयें और रिक्शा पकडकर अपने निजी आवास में पहुंचे । उनका ड्राइवर अनुरोध करता रहा लेकिन गफूर साहब ने कहा कि कार मुख्यमंत्री का है और मैं अब मुख्यमंत्री नही रहा ।
Thursday, July 23, 2009
सूर्यग्रह्ण के तीन मिनट

अपलक नयन गगन गगन
२२-७ के बाद का तारेगना
Tuesday, July 7, 2009
कुत्ता साधु को देखकर क्यूं भौंकता है ?

बिहार के छपरा , सिवान और पूर्वांचल के इलाके में शादियों में होने वाले नाच का कोइ तोड नही था । गाने बजाने के साथ लौंडा का नाच बहुत प्रसिद्ध था । उसमें कलाकारों के द्वारा नाटक का मंचन किया जाता था जो सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत होते थे । यूं कहे तो भिखारी ठाकुर के द्वारा जो नींव डाली गयी थी उन्हीं परंपराओं का निर्वहन उस स्थान के कलाकार करते रहे । हालांकि आज उस नाटक शैली की जगह फूहड औरकेष्ट्रा ने ले ली है । बचपन में उसी नाच का एक छोटा सा नाटक हमने देखा था जो आज तक याद है । नाटक था तीन सवाल ? पहला ..कुत्ता साधु को देखकर क्यूं भौंकता है ? कुत्ता सडक के बीचो-बीच क्यूं बैठता है ? कुत्ता उंची जगह को देखकर ही लघुशंका क्यूं करता है । कुत्ता साधु को देखते ही भौंकने लगता है कि महाराज आपकी जगह यहां नही है आप का तो काम तपस्या करना है ..इश्वर की सेवा करना है ..आप को तो जंगल में होना चाहिये फिर आप दुनियादारी की भीड में क्या कर रहे है।कुत्ता धरती को अपनी माता मानता है फिर भला उसी माता के शरीर पर पेशाब कैसे करें ।कुत्ता सडक के बीचों बीच इसिलिये बैठता है कि इसी मार्ग से संत , साधु , महात्मा के चरण धूल पडे है उन्ही को पूजता है ..कुत्ता चाहता है कि इस जन्म से मुक्ति पाकर इश्वर कहीं उन्हीं महात्माओं के चरणों की धूल में सेवा करने का अवसर दे दें।
Tuesday, May 26, 2009
रात को मैनें मुजरा देखा

बनारस की सुबह ..अवध की शाम के बारे में सुना था । हमारे एक दोस्त ने मुझे बताया कि भाइ उसके साथ अगर आपने सीताराम पुर का मुजरा नही देखा .तो शुरु के दोनों जुमले अधूरें है । हमारे वो अजीज मित्र एक बार मुझे ले गये सीतारामपुर । फिल्मों में मुजरें का सीन देखा करता था । नर्तकी का नाचना ..मसनद लगाकर जमींदार टाइप रइसों का महफील में बैठना ..जाम और पान के साथ वाह वाह कहना आदि दृश्य मेरे दिमाग में नाच रहे थे । जैसे ही शहर में हमने प्रवेश किया ..तबले की थाप और हारमोनियम की आवाज यह इशारा कर रहे थे कि आप निश्चिचित जगह पर पहुंच गये है । हमलोगों ने अंदर प्रवेश किया ...वो उस इलाके की प्रसीद्ध नृत्यांगना या आप जो कह लें ..समाज उसे यह शब्द नही देगा । मोहतरमा ने आदाब कहकर हमलोगों का स्वागत उसी अंदाज में किया जिस तरह की अदा ऐतेहासिक सिरियलों में बादशाहों के लिये कनीज किया करती है । तुरंत बंगाल पुलीस की गाडी वहां आ गइ । मोहतरमा ने १०० रु का कर अदा किया पुलीसवालें वहां से चले गये । बहुत छोटा कमरा था ...मेरे दिमाग में तो पाकिजा वाली हीरोइन मीना कुमारी वाला लंबा सा बरामदा ..पर्दा ..बगैरह बगैरह घूम रहा था । खैर ..तबला वाला बजैया आ गया जो उम्रदराज हो चुका था ..साथ में हारमोनियम मास्टर और बैंजो वाला । मोहतरमा ने डांस शुरु किया । डांस इसलिये कह रहा हूं क्यूंकि अब मुजरे में छाडे रहियें ..और इन्हीं लोगों ने की जगह ...जस्ट चियां चियां ..और ना ना ना नो इंट्री जैसे गानों ने ले रखी थी । डिस्कों और पता नही नये नये जमानें वाले फिल्मी गीतों पर डांस करते हुये प्रत्येक गानों पर २०० रु की छूट भी देनी पड रही थी ...मैने कहा कोइ पुराना फिल्मी गीत गाते तो बेहतर होता ...तबला मास्टर ने कहा कि हूजूर अब पुराने कद्रदान कहा रह गये ..महफिल तो बेनूर सी हो गइ है ..और ये ( यानि नर्तकी ) भी तो नये जमाने वाली है । १० गानें हुये थे और मेरे जेब से २००० रुपये जाया हो चुके थे । हने सोचा इसी महफिल और मुजरे में तो कइ राजवाडे और घराने लूटकर खाक हो गये चलो भागों यहां से और यह मुजरा मेरे जिंदगी का पहला और अंतीम हो गया ।
Sunday, April 26, 2009
केरल जहां चुनावी मुद्दे राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय है ।




