Tuesday, May 11, 2010

क्यूंकि मैं दूरदर्शन में हूं ।

हमारा दोस्त आशुतोष पाण्डेय है । दून में पढा है ..स्मार्ट भी है सिर्फ दिखने में ही नही बल्कि अपनी काबलियत से भी । कुछ दिन पहले वो एक साक्षात्कार में गया ..अंग्रेजी के लब्धप्रतिष्ठित चैनल में ..इंटरव्यू में उसके सामने थे उस चैनल के प्राइम टाइम एंकर या समझलिजीये बौस । सारे प्रश्नों का बेबाक उत्तर देने के बाबजूद उसे बताया गया कि आप दूरदर्शन में है इसलिये खबरें निकाल पाना आपके बस में नही है । आशुतोष ने मुझे बताया कि क्या खबरें निकालना सिर्फ निजी चैनलों के ही बस का है ? खबरें हम दिखाते है और हमारे चैनल के लोग मेहनत भी करते है हम खबरों में मसाले का छौंक नही दे पाते है ..उसे सनसनिखेज नही बना पा पाते है ..हम टी आरपी के खेल से भी अलग है ...हम थोडा पिछे रह जाते है लेकिन खबर पक्की जब तक नही हो जाये नही दिखा पाते है । खबरों के छौंक का एक छोटा उदाहरण हम आपसे शेयर करना चाहते है । भारत अमरीका परमाणु करार के मामले में राजनीतिक सरगर्मीयां अपने चरम पर थी । वाम पार्टियों का एक छोटा सा मूवमेंट भी खबर का एक अहम हिस्सा बन चुका था । एक शाम खबर आयी कि प्रकाश करात १० जनपथ में कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने आ रहे है । १० जनपथ में उस समय संतन की भीड जुट गयी थी पूरे लाव लश्कर के साथ । तमाम तरह के लाइव इनपुट चैनल के महान रिपोर्टर अपने संस्थान के लिये कर रहे थे । ६ बजे का समय शायद निर्धारित था सीपीएम महासचिव का कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने का । ९ बज गये थे ..लेकिन प्रकाश करात का कोइ अता पता नही था । प्राइम टाइम में एक लाइव इनपुट बडे चैनल के बडे रिपोर्टर ने शुरु किया । एंकर ने पूछा लेटेस्ट अपडेट बताइये । रिपोर्टर ने अपने स्पीच में जोरे बाजू का इस्तेमाल करते हुये ब्रेकिंग खबर दिया कि प्रकाश करात आये तो थे कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने लेकिन वो पिछले दरवाजे से आये और मैडम सोनिया गांधी से मिलकर चले गये । रात के ११ बज गये थे सारे चैनलों ने वाइंड अप कर लिया । हम भी वाइंड अप हो गये । उस दिन मुझे पता चला दूरदर्शन और निजी चैनल का फर्क । मैने सोचा कि इस रिपोर्टर को शायद प्रकाश करात ने ही बताया होगा कि भइया हम पिछले दरवाजे से मिलकर चले गये । खबरों की खबर रखने वाले से हमारा क्या मुकाबला । बात आयी गयी हो गइ .. एक दिन के बाद प्रकाश करात की गोपालन भवन में पीसी थी । सारे अखबारनवीस और चैनल के बडे बडे रिपोर्टर पहुंचे थे । पीसी के बाद सवाल जबाब का सिलसिला शुरु हुआ। सब लोग थक गये अपने अपने सवाल पूछ कर ..मसलन आप लोग भौंकते है काटते नही ...बगैरह वगैरह । मुझे तो पिछला दरवाजा वाला सवाल दिमाग में घूम रहा था । मैने पूछ दिया कि कल आप १० जनपथ में पिछले दरवाजे से कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने गये कृप्या आप बतायें एटमी करार पर क्या बात हुइ । प्रकाश करात ने कहा कि मैं कल दिल्ली में था ही नही । मैने अपना माथा पीट लिये । तब मुझे अहसास हुआ कि आखिर खबरों के निकालने की तरकीब क्या होती है । हाल ही में एक दिन गोपालन भवन में हरिकिशन सिंह सुरजीत पर एक बुकलेट का विमोचन था प्रकाश करात , सीताराम तथा कामरेड सुरजीत की पत्नी भी उपस्थित थी । इसी बीच हमारे दूरदर्शन के एक पत्रकार दोस्त ने फोन किया कि आलोक जी कानू सन्याल ने आत्म हत्या कर ली है हो सके तो इसपर एक बाइट ले लिजीये । निजी चैनल के एक बडे रिपोर्टर से हमने वह बात उन्हे कही कि प्लीज ये सवाल पूछिये ...उन्होने कहा कि हु इज कानू सान्याल ? दोस्तों तों वो बीट रिपोर्टर थे उसमें भी बडे चैनल के । यहां आप कतइ ये नही समझेंगे कि मैं अपनी शेखी बघार रहा हूं ... अरे हम तो रिपोर्टर कहलाने के तो काबिल ही नही है ...इसलिये कि दूरदर्शन में है ।


6 comments:

सतीश पंचम said...

दूरदर्शन से हैं इसलिए निजी चैनल में सेलेक्शन न हुआ.....अच्छा है...दिमागी फितूरों से बचे रहेंगे।

मुझे लगता है टी आर पी फी आर पी के चक्कर में ससुरों ने खबरों का लत्ता बनाकर रख दिया है।

निजी चैनलों के न्यूज आदि पर तो वैसे भी मैं कम ही विश्वास करता हूँ...खबरों की वैलिडेटिंग का काम दूरदर्शन करता है यह मैं भी मानता हूँ।

राम त्यागी said...

बहुत ही मजेदार लिखा.
भारत में सरकारी महकमे के कर्मचारियों को स्वभाववश काम न करने वाला मानते है और इसलिए दूरदर्शन का भी नाम खराब है
दूरदर्शन को समय के साथ थोडा बदलने की जरूरत तो है.
साथ में ही मुझे प्राइवेट चैनल भी पसंद नहीं. नफरत के कायल है वो भी

Udan Tashtari said...

अरे हम तो रिपोर्टर कहलाने के तो काबिल ही नही है ...इसलिये कि दूरदर्शन में है ।


हा हा!! हाय ये मायूसी!!


एक अपील:

विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

काजल कुमार Kajal Kumar said...

शुक्र मनाइए कि आप दूरदर्शन में (लालाओं की कीचड़ से कहीं बेहतर है ये.)

गुस्ताख़ मंजीत said...

आलोक भाई आपकी पीड़ा को हमसे बेहतर कौन जान सकता है..जाके पैर न फटे बिबाई सो क्या जाने पीर पराई। डीडी की लाख बुराईयां सहीं, लेकिन मौजूदा दौर में खबरों का असली मुहावरा तो उसी के पास है।

Gautam Kumar Kutariyar गौतम कुमार कुटरियार said...

आप भी न! किनसे तुलना कर रहे हैं दूरदर्शन की! ये निजी चैनल तो न्यूज चैनल कम मनोरंजन चैनल ज्यादा हैं।