Friday, May 16, 2008

जातीयता का महाभारत




कहा जाता है कि अंग्रेजों ने बहुत सी अच्छी और बुरी चीजें हिन्दुस्तान को दी।राष्ट्रीयता दी , इतिहास लेखन दिया साथ में सांप्रदायिकता और जातीयता की भी नेमत बख्शी । वैसे भारत में जातीयता मनुस्मृति की देन है।इसी जातियता ने हिंदुस्तान की हर पराजय में प्रमुख भूमिका भी अदा की। हेमू , बैरम खां से युद्ध में नही हारा बल्कि जातिय गद्दारी ने उसे हराया , शिवाजी को बनारस के ब्राह्णों ने उसका राज्यरोहन नही कराया क्यूंकि वह क्षत्रिय नही था।भारत में आपसी फूट के बल पर ही इस्ट इंडिया के पांव जमें। इस्ट इंडिया कंपनी ने पहले देशी लोगों से निम्नतर सेवाए लेनी शुरु की। उसके बाद उन्होने किरानी का काम लेने के लिए देशी लोगों को पढाना शुरु किया। 1834 में कानून के तहत एडीएम के पद पर देशी लोगों की बहाली शुरु कर दी गइ । फारसी उस समय शासन व्यवस्था की भाषा थी। पढने लिखने का सिलसिला उस समय कायस्थ जाति के लोगों में काफी पहले से था।मुगलों के समय से ही उन्होने फारसी पढना शुरु कर दिया था। इस खास जाति का जमाने के साथ बदलने की अद्भुत क्षमता है।अंग्रेजों की पढाइ में भी वे औरों से काफी आगे निकल गये थे। जमींदार और राजाओं के बेटोँ में भी शासक बनने की होड सी मच गइ। अब सारे लोग अंग्रेजी पढने की ओर उन्मुख हो गये। सर सैयद को भी लगा कि मुसलमान अगर अंग्रेजी नही पढेंगे तो शासक दल की पंक्तियों में शामिल नही हो सकेंगे। उन्होने अलीगढ में अंग्रेजी वर्नाकुलर स्कूल की स्थापना की । फिर क्या था पूरे हिंदुस्तान के मौलवियों ने फतवा जारी किया कि सर सैयद मुसलमानों को क्रिस्तान बनाना चाहता है।उसके बाद 1877 या 1879 में लखनऊ में अखिल भारतीय कायस्थ सम्मेलन हुआ। सम्मेलन के निर्णयानुसार जाति के नाम पर देशव्यापी कायस्थ पाठशाला खोलने की बात कही गइ।जाति के नाम पर अखबार निकला । इसके ठिक दो वर्षों के बाद पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्णण सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन के निर्णय के अनुसार ग्रियर्सन भूमिहार ब्राह्णण कालेज और स्कूलों की स्थापना की गइ। बाद में कालेज का नाम बदलकर लंगट सिंह कालेज ( मुजफ्फरपुर , बिहार में स्थित ) कर दिया गया , लेकिन स्कूल का नाम अभी भी ग्रियरसन भूमिहार ब्राह्णण कालेजियट बरकरार है। इसके दो वर्षों के बाद मारवाडी सम्मेलन हुआ। फिर अखिल भारतीय सरयूपारीन ब्राह्णण सम्मेलन । ब्राह्णण स्कूल और ब्राह्ण्ण अखबार निकाले गये जिसके संपादक प्रताप नारायण मिश्रा और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे विद्वान लोग हुए । इन सबका क्रम दो दो वर्षों का था । उसके बाद क्षत्रिय सम्मेलन हुआ। बनारस में उदय प्रताप क्षत्रिय कालेज खुला जिसमें क्षत्रिय लोगों को घुडसवारी सिखाया जाता था और उसके बाद उन्हे पीने के लिए दूध भी दिये जाते थे।20 वीं सदी की शुरुआत में अखिल भारतीय गोप सम्मेलन और 1911 में दुसाध सम्मेलन हुआ था ।जातीय सम्मान बढेँ तो जातिय हमलें भी तेज हुए। उन हमलों का काट ढूंढा गया । कायस्थों ने अपने को ब्रह्मण का मानसपुत्र चित्रगुप्त का वंशज कहा और उनकी पूजा अर्चणा शुरु कर दी । विरोधियों ने इसे जायज नही माना। कायस्थों की एक उपजाती के संबंध में केशकारों ने घिनौना अर्थ दे डाला। ब्राह्णणों ने भूमिहार ब्राह्णोणों को ब्राह्णण मानने से इनकार कर दिया। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बजाप्ता ब्रह्मषि वंश विस्तार ही लिख डाला। 1920-21 आते आते जातिय कटुता आसमान छूने लगी । गवरनर के सलाहकारों की ऐसेम्बली में तीन मंत्री हुआ करते थे , मौलाना मजहरुल हक , सर गणेश दत्त , और सच्चिदानंद सिन्हा। मौलाना मजहरुल हक साहब संत माने जाते थे लेकिन सर गणेश दत्त और सच्चिदानंद सिन्हा में भयंकर होड मच गइ।बिहार में कायस्थ बनाम भूमिहारों के बीच गर्दनकाट प्रतिद्वंदता शुरु हो गइ।सर गणेश दत्त ने पटना विश्वविद्यालय में पुअर भूमिहार ब्राह्णण स्टूडेन्ट स्कालरशीप की शुरुआत की जो आज तक जारी है।कहनेवाले तो यहां तक कहते है कि स्वामी सहजानंद की ताकत को कम करने के लिए बाबू राजेन्द्र प्रसाद की सलाह पर खेतिहर मजदूर सभा की निंव रखी गयी ।चुनाव जीतने के लिए कांग्रेसियों ने इसे जमकर भंजाया। कहा जाता है कि समाज शिक्षीत होगा तो जातियता की बिमारी स्वतः दूर हो जाएगी लेकिन इस दर्शन का विरोध स्वंय बिहार के कालेज तथा विश्वविद्यालयों में मिल जाऐँगे।दूर छोडिये आज भी पटना मेडिकल कालेज हास्टल का प्रत्येक रुम जातियों में बंटा पडा है। आजादी के बाद पंडित चंद्रदेव शर्मा के द्वारा लिखित " बापू के सपूतों का राज" नाटक प्रकाशित हुइ थी जिसे विहार सरकार ने बैन कर दिया था।25 साल के बाद पटना हाइकोर्ट ने इस बैन को हटाया। इस नाटक में जातियता का भयंकर वर्णण है। आजादी के बाद राम मनोहर लोहिया का नारा सौ में साठ हमारा है का लगा । काका कालेकर की अध्यक्षता में कमीशन की स्थापना की गइ। तत्कालिन सरकारों ने उसे लागू नही किया।मंडल कमीशन बना ॥उसकी रिपोर्ट भी ठंडे बस्ते में पडी रही ।1967 और 1974 के आंदोलन में जातीयता जडता टूटी थी । संघर्ष के दौरान जाति की बात नही उठी थी । 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन को लागू किया जिसकी भयंकर प्रतिक्रिया हुइ।उस समय एक प्रश्न उठा था । आरक्षण आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा था । कोइ व्यक्ति तथा राजनीतिक दल नही बल्कि एक सयाने ने कहा ..मीडिया...। मीडिया हेडलाइन देकर इस आंदोलन को चला रहा था । वीपी सिंह की सरकार गिरते ही उसका काम हो गया । राव साहब की सरकार ने आराक्षण को अमली जामा पहनाया। विश्वविद्यालयो में हंगामा फिर शुरु हुआ, मीडिया ने तवज्जों नही दिया। आंदोलन अपनी मौत मर गया क्युंकि मीडिया का काम हो चुका था। उसका मुख्य मकसद वीपी सिंह की सरकार को गिराना था क्यूंकि प्रबंधन में मजदूरों की सहभागिता और संविधान में काम के अधिकार कानून को पूंजीपती वर्ग पारित नही होने देना चाहते थे।आम आवाम के अन्दर इतना आक्रोश था कि बिना कोइ ठोस कार्य किए लालू अपनी अनपढ वीवी के साथ बिहार में 15 बरस तक गद्दी पर बैठे रहे।पंडित को गाली देने वाले कर्पूरी ठाकुर के शिष्य लालू प्रसाद अब बिना पूजा पाठ के कोइ काम नही करते। पिता की मृत्यु पर समाजवादी नीतिश कुमार ने सर नही मुंडवाया था , बडी चर्चा हुइ थी , लेकिन पत्नी के मरने के बाद उनके समाजवाद की हवा निकल गइ।मुट्ठी भर सवर्ण कहने वाले नीतिश जी आज उसी की गोद में सो रहे है। संसकृत का श्लोक है कि जिस रास्ते बडे लोग जाते है वहीं रास्ता हो जाता है। लालू जी भी उसी रास्ते गये जिसपर जमींदार और कांग्रेसी गये । उसी की नकल होने लगी। मायावती और मुलायम भी उसी रास्ते पर चल रहे है।1974 में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडने वाले लालू प्रसाद बाद में खुद ही भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गये। उत्तर भारत में माडल क्या है ? राजा , जमींदार और कांग्रेसी । बिहार के टिकारी राज्य के अन्तर्गत रहने वाले हर भूमीहार के यहा महंगा व्यंजन विरंज बनता है । बिहार के किसी भी दूसरे भूमिहारों के यहां यह व्यंजन नही बनता । टेकारी महाराज के यहां विरंज बनता था । जमींदारी उन्मूलन के बाद अपने को टिकारी महाराज मानते हुए उस क्षेत्र के गरीब भूमीहार के यहां भी यह महंगा व्यंजन बनता है।लालूजी मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने गांव गोपालगंज के फुलवरिया गये । उनकी मां ने पूछा .. बबुआ तू का हो गइल बाडअ..। लालूजी ने कहा माइ हम बिहार के हथुआ महाराज हो गइल बानी।पटना जंक्शन पर एक बार बैठा था । एक बैँड बाजा बजाने वाला मजदूर भी मेरे पास बैठा था । मालूम हुआ कि वह रविदास है सट्टा पर बाजा बजाता है। एकाएक एक राजनीतिक पार्टी का जूलुस निकला । वह हंसा और बोला सब जात पर मरता है ..इ खातिर हमनी भी सब पार्टी छोडके अप्पन जात वाला पार्टी बसपा में चल गइली हे..स्पस्ट है संघर्ष से ही यह जातियता टूट सकती है ..दूसरा और कोइ रास्ता नही जिससे जातियता पर हमला हो सकें ।


( रविश कुमार की दवा की जाति के लेख ने मुझे प्रेरित किया कि जातियता के इस बहस को और आगे ले जाया जाय जिससे समाज में जडता खत्म हो। )


4 comments:

ग़ुस्ताख़ said...

आलोक भाई, यह नव ब्राह्मणवाद है। जाति के ब्राह्णण तो दलित हो गए हैं। आपको गिनती के ब्राह्णण भी ज़मींदार नहीं मिलेंगे।
उनकी जगह दूसरी जातियों ने ले ली है। निचली जातियां या निचला तबका जब ऊपरी तबके की जगह लेता है तो वह अपनी गद्दी छोड़ना नहीं चाहता। इसे अधिनायकवाद कह सकते हैं। कम्युनिस्टों के साथ ऐसा हो चुका है, जहां वे खुद को उदारवादी कहते तो हैं लेकिन खुद की विचारधारा के प्रति कट्टर होते हैं। ये हिप्पोक्रेसी है या नहीं.. ऐसे ही लालू या मायावती भी हैं, जिन्होंने पिछड़ों को मिथ्याभिमान देने के अलावा कुछ नहीं दिया...

कुमार आलोक said...

gustakh bhai sahee kahate hai lekin is raaste par chalanaa sikhaaya kisane hai? abhee yeh daur chalegaa kam se kam 50 varsh...

Suresh Gupta said...

जति के नाम पर सब मलाई खाते रहे हैं और खा रहे हैं. पहले सवर्ण खाते थे. अब दलित खा रहे हैं. किस ने दिया यह मन्त्र अब इसके बारे में बात करने से क्या फायदा.

कुमार आलोक said...

सुरेश भाइ मोहल्ले पर बडी धूम मची थी जातियता और जातिविशेष पर इसलिये लिखना मजबूरी हो गया था..