Friday, December 28, 2007

मैं कवि बन गया

बात सन १९९० की है , मैं बारह्बीं क्लास में पढता था . एक बार मेरे कस्बे में एक बडा मुशायरा होने वाला था. मैं लिखता रह्ता था लेकीन मंचिय कवि का दर्जा नही प्राप्त कर पाया था. मैने आनन फ़ानन में एक कविता लिखी और आयोजक के पास गया , आयोजक शहर का एक धनाढ्य व्यक्ति था. उसने मेरी
कविता को देखा और बोला कि पागल यही कविता है ? कविता का मतलब फ़ूल पौधा , पहाड , जंगल होता है , उसने मेरी कविता को फ़ेंक दी. मैने हार नही मानी , मुशायरा शुरु हो चुका था , मैं भी कवियों की तरह शाल ओढ्कर , मुंह छुपाकर मंच पर बैठ गया . मैने सोंचा कि मेरी बारी कैसे आयेगी , मैने दूसरे आदमी से एक पुर्जे पर अपना नाम लिखा आलोक मसौढ्वीं , साहिर लुध्यान्वी , औए काका हाथरसी की तरह , पुर्जा मंच के सदर के पास पहुंच गया. सदर मेरे पिता थे. खैर उन्हें पता नही चला कि उन्का ही बेटा आलोक मसौढ्वीं है . मेरी बारी आ गयी , मैने सोचा कि मत चूको चौहान . फिर मैने शुरु की अपनी कविता और पिताजी के डर से एक सांस में ही पूरी कवीता पढ गया . अरे यह क्या ? लोग तालियां बजा रहे थे और बे बोले वंस मोर , जिसने मेरी कविता को रिजेक्ट कर दिया था वो कह रहा था वाह यह लडका तो शुरु से ही प्रतिभाशाली था.
आप ये मत सोचीये कि मैं अपने मुंह मियां मिठु बन रहा हुं . सन ९० में अमेरिका ने इराक पर हमला बोला था , और हमारी सरकार देश कि हर समस्या को खाडी युद्ध से जोडकर देख रही थी . बहुत ज्यादा आपका दिमाग खा गया पेश है आपके सामने वही कविता.

तुम देश में जमाखोरों को प्रश्र्य देते हो
और फ़िर खाडी संकट का रोना रोते हो ?
एक कहावत थी कि तेल नही तेल की धार देखो
लेकीन अब न तेल मिलेगी और ना ही उसकी धार
बच जायेगी बस लुटेरों की बंदरबांट.
मंत्री जी की कार डकार रही है पेट्रोल के उन्माद से
मगर गांव की बुधीया जला रही है लौ अपने आंसुओं के उफ़ान से.
बुधीया कह्ती है कि खाडी का और मेरे गांब का संकट एक है.
क्यूंकि वहां कुवैत सद्दामो के द्वारा और यहां गांब पंचायतों के द्वारा लूटे जाते है.
मैंने कहा जब कुवैत को बचाने बुश आ सकते है तो गांब को बचानेवाला कोइ नही ?
उसने कहा यहां बुश का नही बल्कि घूस का राज है .
मैं अचंभित रह गया उसके जबाब से और सोंचा इस देश को भगवान भी नही बचा सकता अप्ने पुन्य प्रताप से .
( समाप्त)
कवि बननेलायक कविता थी या नही आप बताइयेगा . शुक्रिया

3 comments:

Amit Kumar said...

Thanks Alok sir for sharing ur past experience to be a poet tyhrough(misguidedmisile) blogspot.

I means, that if ur compose is not good enough to be a peot, ur rythm is good to expose himself before the stage of the prominent poet of ur locality.

I have a question that "Was it ur first effort to be a poet?" Now at present time to get a job in any for fresher is a little bi possible, same things was happened with u. So i suggest that not too much worry about this. Make a suitable effort to be a poet. My best wishes is always with u.

Thanking U a lots.

Sharique Ahmad said...

Kya baat hai mujhe garv hai ke aap ke chhtra chhaye me rahne ka saubhag mila

Sharique Ahmad said...

Kya baat hai mujhe garv hai ke aap ke chhtra chhaye me rahne ka saubhag mila